संपादकीय

आवाहन - जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

गहिराह विचार 
परिवर्तन खातिर
आवाहन 
होखी 
कबों न कबों। 

अइसन सोच 
गतिहीन बा 
अबहिन 
कवनों गुरुत्व मे 
शोध के विषय। 

सभ सुध बुध 
चमत्कार के जोहत 
मनई
धुंध मे हेराइल 
बौडियात दिखल। 

मनलुभावन बातिन के 
उठत ज्वार 
थमल नइखे 
थमला के असारों नइखे 
भरमल बा सभे। 

कब आखिर कब 
जागी ई लोग 
के जगाई 
कइसे जगाई 
एगो प्रश्न बा। 

आँख मिलावल 
कहे मे त नीमन बा
बाउर हो जाला 
कइला पर 
दरद के सौगात मिलेला। 

उबाल उठी अब 
समय के माँग 
इहे बा 
विश्वास दमगर 
उन्मादों बा संगे। 
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अंक - 69 (1 मार्च 2016)

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