संपादकीय

अइसने घरवा - जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

तुनक के बबुआ मत बतियावा 

सभकर ऐंठल छूटल। 
अइसने घरवा फूटल॥

टुकुर टुकुर सभ देखी तोहके 
निहुर निहुर नरियाई। 
मन मे फाड़ पडल बा जब जब 
बनल बखरिया टूटल॥ अइसने ...... 

बहुत बघरला आपन शान 
थोड़ीके मे बउरइला। 
नाही बुझाइल नीक निहोरा 
राउर भाग बा रूठल॥ अइसने ....... 

बनला मे सभ भाजी मारी 
सांय सांय समुझाई। 
भर गइल बा पाप के घरिया 
सगरों मची उथल पुथल॥ अइसने .... 

सबका फटल मे अंगुरी डालल 
सबका के चमकावल। 
जब जब नेकी दूर पराइल 
भर दिन घरनी सूतल॥ अइसने ...... 
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अंक - 80 (17 मई 2016)

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