संपादकीय

संपादकीय: अंक - 81 (24 मई 2016)

दबाव में भोजपुरी 

केवनो भाखा केतना जियतार अउरी चलता-पूरजा (गतिशील) बे एसे ओह भाखा के बदलाव के सङगे जीए कऽ कूबत कऽ पता चलेला। जिनगी छिन-छिन बदलेले अउरी ई बदलाव जिनगी के सगरी कोरा-इकोरा ले असर देखावेला अउरी जिनगी में आइल सगरी बदलाव से भाखो के अपना बच-बचा के बदलत रहे के परेला। अउरी एह सवाल अउरी चुनउती से दुनिया के सगरी भाखन के जुझे के परेला अउरी भोजपुरी एह झमेला से अलगा नइखे। भोजपुरी पर प्राकृत, पाली अउरी संस्कृत से असर सभसे बेसी बा। कुछ लोगन के मत बा कि भोजपुरी संस्कृत से जनमल तऽ ओही जा बहुत लोगन के ई मत बा भोजपुरी प्राकृत से जनमल अउरी पाली एकरी बिकास में सहजोग कइलस। सैकड़न साल कऽ जतरा के बाद भोजपुरी के भेंट भइल फारसी अउरी उर्दू से। एह दूनू भाखन के बहुत बरिआर असर भोजपुरी पर परल अउरी अनगिनत फारसी आ उर्दू के सबद भोजपुरी में आ के भोजपुरी के हो गइलन सऽ। एही तरे भोजपुरी के भेंट अंग्रेजी से भइल अउरी जाने केतने सबद भोजपुरी अपना लिहलस। आज ई कहल मुसकिल बा केवन सबद संस्कृत, प्राकृत, पाली, फारसी, उर्दू आ अंग्रेजी से निकल बा। कुछ सबदन के उच्चारन अउरी माने जस के तस भोजपुरी अपना लिहलस तऽ कुछ सबदन के आ तऽ उच्चारन बदल गइल भा माने बदल गइल अउरी कहीं-कहीं तऽ दुनू बदल गइल बा। एतने ना भोजपुरी देस, काल अउरी परिस्थिति के देखि के आपन लिपि ले बदल लिहलस। 
अपनी एह जतरा में भोजपुरी सरुप धीरे-धीरे बदलतस गइल बा पर ई बदलाव भीतर से भइल बा। भोजपुरी जेवना केवनो सबद भा बिधा के अपनवलस ओकरा के भोजपुरी सोख लिहलस। ऊ सबद भोजपुरी के माटी में सना गइल बाकिर समय बड़ी तेजी से बदल रहल बा अउरी ई तेज बदलाव भोजपुरी भाखा के लोक संस्कार अउरी सरूप दुनू पर आपन असर देखा रहल बा। जेवना भाखा सैकड़न सालन से चुपचाप बिकास करत गइल आज ओह भाखा पर कई तरह बाहरी दबाव पर रहल बा। जदी एह दबाव देखल जाव तऽ ई दबाव तीन तरफा बा। पहिला तरफ से दबाव पड़त बा लिपि कऽ दूसरा बा दोसर भाखन कऽ आ तीसरा बा तकनीक कऽ। 
जब से भोजपुरी आपन लिपि कैथी छोड़ि के देवनागरी अपनवलस तब से भोजपुरी में संस्कृत अउरी हिन्दी के सीधे-सीधे दखल होखे लागल। हिन्दी के बिकास अउरी भोजपुरिया लोगन के खुलल दिल से अपनावे दिसाइन कइल परियास से हिन्दी चुपचाप बाकिर बहुत बरिआर दखल सुरू कइलस अउरी एतने ना बहुते सबदन के बेदखल करऽ रहल बे। इहे काम अंग्रेजीयो कर रहल बे काँहे आज ई आजिविका कमाए के भाखा बे अउरी आधुनिक तकनीक कऽ बढत उपयोग सहजोग कर रहल बा। भोजपुरी अउरी हिन्दी के लिपि एगो हो गइला से, भोजपुरी पर हिन्दी के महता, अंग्रेजी के आजिविका के भाखा बनला अउरी तकनीक के जिनगी के हिस्सा हो गइला से भोजपुरी कऽ सगरी इकोसिस्टम बदल गइल बा। 
आज जरूरत ई बा भोजपुरी के खाली मीन-मेख निकालल बन कऽ के ओह इकोसिस्टम के ठीक कइला के काम बा ना तऽ आज जेवन भोजपुरी लउकत बे काल्ह ऊ एगो अ इसन रुप ले ली कि चिन्हाई ना की ई भोजपुरिए हऽ। अइसन नइखे के सबदन के ना मरे के चाहीं। जरुर मरे के चाही। उपयोग खतम हो गइला पर सबद मरबे करेला। बाकिर दोसर भाखा अपनावे के दिसाईं परियास में भोजपुरी के सबदन के मारल ठीक नइखे। जरूरी बा कि आज भोजपुरी के आपन संस्कार के बँचावल जाओ ना तऽ एकर लोक-भाखा कब मरि जाई पते ना चलि। अइसन नइखे ई खतरा खाली भोजपुरिए पर बलुक सगरी भाखा एहि चुनउती से जुझ रहल बाड़ी सऽ।
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1 टिप्पणी:

  1. जरूरत बा भोजपुरी के वास्तव में आपन भाषा मनला के।बात सरल बिया आ करेवाला के हास्यास्पदो श्रेणी में राखल जा सकऽता, बाकिर कम से कम हमरा अनुभव के त ईह सच्चाई बा।
    कैथी लिपि के हम अभी तक गंभीरता से नइखीं लेले।हो सके त एह पर कबो शोधपरक प्रामाणिक सामग्री डालीं।
    - डाॅ. रामरक्षा मिश्र विमल

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