संपादकीय

भोला प्रसाद 'आग्नेय' जी कऽ दू गो गजल

1

जमीन पे नभ से उतर के आ गइलन।
सफर के नाम कुछ कर के आ गइलन॥

ख्वाहिश रहे फूलन के खुश्बू के।
झोली में काँटे भर के आ गइलन॥

मन में तमन्ना बा अमर होखे के।
सभकरा नजर में मर के आ गइलन॥

जियते आपन मजार बनावे बदे।
उजाड़ कवनो छप्पर के आ गइलन॥

जवने के रक्षा रहल उनुके जिम्मा।
ओही क्यारी के चर के आ गइलन॥

उड़ानो कल्पना के अब का होई।
जब पंख गीत के कतर के आ गइलन॥

चाहत में गजल के थक के पहिलहीं
धर्मशाला में ठहर के आ गइलन॥

जवन शब्द बाँचल रहे ‘आग्नेय’ के।
उहो ऊ डीठारे हार के आ गइलन॥ 
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2

जवन चाहीं ओ के गँवावे के पड़ल।
ना चाहीं ऊ हे अपनावे के पड़ल॥

सपना तऽ टूट के टुकी-टुकी हो गइल
बाकिर फेरु माला गुहावे के पड़ल॥

ई जानि के कि नइखे फायदा कवनो।
करेजा चीर के देखावे के पड़ल॥

जे रहे डूबल पाप के समुन्दर में।
कपारे पऽ अपने बइठावे के पड़ल॥

तूफान तऽ हिया में उठत रहे बहुते।
समय के साथे मन दबावे के पड़ल॥

इन्सानियत के बदलत परिभाषा के।
मजबूरन हमें गले लगावे के पड़ल॥

बसखट के पावा, पाटी चउकी के।
मिला के बड़हन बेड बनावे के पड़ल॥

पोस ना सकलन गाय-गोरु ‘आग्नेय’।
महज पिल्ला पऽ साध बुतावे के पड़ल॥ 
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अंक - 79 (10 मई 2016)

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