संपादकीय

मुक्त जी कऽ भोजपुरी कविता आ कवित-विवेक - अक्षय कुमार पांडेय

‘जार्ज ग्रियर्सन भोजपुरी कऽ शक्ति-सामर्थ्य कऽ पहिचान करत कहिले बाड़न कि-‘‘भोजपुरी बहादुरन कऽ भाषा हऽ। भोजपुरी क्षेत्र में बसे वाला लोग अपना विशिष्टता क कारन दूनों बिहारी बोली (मैथिली, मगही) बोले वालन से नितान्त भिन्न बाड़न। ई लोग वास्तव में सतर्क आ क्रियाशील जाति के लोग हऽ। एह लोगन में रूढ़िवादिता कऽ अभाव बा आ युद्ध बदे युद्ध में लागि जाये कऽ प्रवृत्ति बा। ई लोग पूरा भारत में फइलल बा आ एह लोगन में हर व्यक्ति कवनो सुअवसर से आपन भाग बनावे खातिर हमेशा तइयार रहेला। ई लोग बहुत बड़ संख्या में हिन्दुस्तानी सेना में भर्ती होके ओके सुसज्जित कइल आ 1857 के सिपाही विद्रोह में महत्त्वपूर्ण भाग लीहल। जइसे आयरलैण्ड कऽ निवासी हाथ में लाठी लेके चले कऽ सौखीन होलन, ठीक ओइसहीं लमहर-कद-काठी वाला शक्तिशाली भोजपुरियन के हाथ में लाठी लेके प्रायः अपना घर से दूर खेत में जात देखल जा सकेला। भोजपुरी अइसने लोगन कऽ भाषा हऽ।’’ आज भोजपुरी जार्ज ग्रियर्सन कऽ एह कथन से बहुत आगे निकल चुकल बिया। एकर साहित्य उत्तरोत्तर विकासमान बा। एकर महत्ता कऽ पहिचान करत वीर कुँवर सिंह विश्वविद्यालय, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, गोरखपुर विश्वविद्यालय, महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ, मगध विश्वविद्यालय आ जे0पी0 विश्वविद्यालय एह भाषा में अध्ययन-अध्यापन आ शोध कार्य कराके एके विशेष सम्मान देले बाड़न। आज पूरा विश्व में भोजपुरी 25 करोड़ जनता कऽ साहित्य-संस्कार आ स्वत्व कऽ भाषा बिया। ई भारत कऽ साथे मारिशस, फीजी, गुयाना, सूरीनाम, दक्षिण अफ्रीका, त्रिनीदाद आ नेपाल जइसन देश में सम्पर्क भाषा से लेके राष्ट्रभाषा तक के ऊँच आसन पर विराजमान बिया। एकरा शक्ति-सामर्थ्य कऽ परख-पहिचान भारतीय विद्वानन क अलावे बीम्स, जार्ज ग्रियर्सन, विलियम क्रुक, फ्रेजर आ ए0 जी0 सिरेफ जइसन विदेशी विद्वान लोग कइले बा। आज साहित्य कऽ अइसन कवनो विधा नइखे जवना में एह भाषा कऽ दमगर उपस्थिति न होखे। एह भाषा में छोट-बड़ पचासन पत्रिका प्रकाशित हो रहल बाड़ी सऽ। वर्तमान में भोजपुरी, संविधान कऽ आठवीं अनुसूची में पइसार खातिन पूर्णरूप से तइयार बिया। अइसन समय में भोजपुरी कऽ जनपदीय साहित्य गहन अनुशीलन क साथे पुनर्मूल्यांकन कऽ माँग करत बा। 

गाजीपुर जनपद कऽ भोजपुरी कवियन कऽ वर्गीकरण अगर विषयगत विविधता के आधार बनाके कइल जाव तऽ पं0 गौरीशंकर मिश्र ‘मुक्त’, भोलानाथ ‘गहमरी’ आ हरिवंश पाठक ‘गुमनाम’ कऽ तिराह परम्परे आज फूलत-फरत नजर आवत बिया। उमिर कऽ क्रम में अगर देखल जाव तऽ गाजीपुर कऽ जीयत भोजपुरी साहित्यकारन में डॉ0 विवेकी राय कऽ बाद ऊपर से पहिला पायदान पर पं0 गौरींशंकर मिश्र ‘मुक्त’ बाड़न; जवन आज 85वाँ बरिस में प्रवेश कऽ चुकल बाड़न। मुक्त जी कऽ जनम अनन्त चतुर्दशी सन् 1929 ई0 के गाजीपुर जनपद कऽ रेवतीपुर गाँव में भइल; जहाँ कवि-मन शुरुआती 18 बरीस तक खेत-बधार, पशु-पंक्षी, फूल-फुलवारी, धरती-आकाश से नेह-छोह जतावत रहे। चाहे एके एइसे कहल जाव कि कवि-मन लोकरस कऽ पान करत रहे। गाँव-देहता कऽ पाँव-पलग्गी कइल आ माटी से प्यार के आपन मूलधन मानत रहे। ओकरा बाद रेलवे कऽ सेवा आ सेवा से अवकाश पवला तक कऽ जीवन कलकत्ता, कम्युनिज़्म आ कविता से जुड़ल रहल। मुक्त जी भोजपुरी माटी पत्रिका कऽ सह.सम्पादन कइला क अलावे ‘फूल महुआ के’, ‘अँजोर’, ‘रतिया के भोर’ आ ‘लोकरस जइसन भोजपुरी काव्यकृति; ‘आस्था कऽ खँड़हर’ आ ‘गंगा’ जइसन भोजपुरी कहानी संग्रह क साथे ‘उद्गार’ आ ‘क्रांति-प्रदीप’ नियर हिन्दी कऽ काव्य-ग्रन्थ सिरजले बाड़न।

मुक्त जी कऽ भोजपुरी काव्य-सरणी से गुजरला पर ई लउकल कि एह विराट काव्य-व्यक्तित्व कऽ सम्यक् मूल्यांकन जरूरी बा; जेसे गाजियेपुर कऽ ना बल्कि स्वस्थ भोजपुरी साहित्य कऽ सम्पन्नता सुनिश्चित हो सके। एह समीक्षात्मक आलेख कऽ मूल उद्देश्य मुक्त जी कऽ भोजपुरी काव्य कृतियन कऽ आलोक में मुक्त जी कऽ कवित-विवेक के देखल-परखल बा। एह काव्य-कृतियन में ‘फूल महुआ के’ (1995-95गीत), अँजोर (1996-100 सवइया छंद में आत्मकथा), रतिया के भोर (2001-47 गीत) आ लोकरस (2002-77 गीत) बा। मुक्त जी कऽ काव्य रचना में विविधता कऽ साथे उनकर विराट रचना फलक प्रशंसा लायक बा; जवना में सूरज, चाँन, आसमान, लहर, किनार, अरार, बरखा, भूमि, भोर किरिन, घन अन्हार, हवा, पेड़-रुख, पोस-परानी आदि समाहित बा। कवि-गीतकार मुक्त जी कऽ प्रेरणस्रोत भोजपुरी लोकगीत रहल बा। ऊ ‘फूल महुआ के’ कऽ ‘आपन बात’ में कहत बाड़न कि- ‘‘साँच कहीं तऽ सरस कण्ठन से गावल मधुर भोजपुरी गीते हमार गुरु हऽ। एही कुल गीतन के सुन के आ पढ़ के हमरा गीत लिखे कऽ प्रेरणा मिलल। ए खातिर हम भोजपुरी कऽ अमर लोक गायकन कऽ आभारी बानीं। देहात में कतहूँ बिरहा, कजरी आ भोजपुरी गीतन कऽ आयोजन होई तऽ हम ओइजा गइला बिना ना रहब। कबो रात बीत जाई।’’ मुक्त जी में लोकरस कऽ सोता लोकगीतन के सुनला से फूटल। जवन उनका के आपन मातृभाषा भोजपुरी में कुछ रचे खातिर प्रेरित कइलस। असल में जीवन कऽ सार जेतना सहजता से अपना मातृभाषा में अभिव्यक्त होई ऊ दुसरा भाषा में ना हो सकेला। दिनकर जी से बात करत कबो कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ टैगोर कहले रहलन कि-‘‘आपन मातृभाषा बांग्ला कऽ अलावे कवनो दुसरा भाषा में अपना भाव कऽ सटीक अभिव्यक्ति ना कऽ पाइलाँ।’’ मुक्त जी एही भाव-भूमि कऽ आदमी हउवन। उनकर मन धरती कऽ रस-गंध आ माई कऽ बोली-बानी भोजपुरी से गहिर जुड़ाव राखेला। 

मुक्त जी कऽ काव्य-गुरु पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ हउवन। उग्र जी कऽ उग्रता मुक्त जी कऽ स्वभाव में उन्मुक्त भाव से भरल बा। उग्र स्वभाव कऽ व्यक्ति हठयोगी हो सकेला अनुनयी नाहीं। हठी बालक अपना जिद कऽ सामने माई के झुका देला। ओहीतरे गीतकार मुक्तो हठ ठानि ले ले बाड़न कि हे माता! तोहके रास्ता देखवहीं के पड़ी, डहरी में अन्हार बा, हमके लउकत नइखे तोहके दियना जरवहीं के पड़ी-

‘‘दियना देखा के माई रहिया बतावऽ,
हमरा डहरिया में जोतिया बिछावऽ,
अँगुरी धरा के पहुँचावे के परी।
माई हमरो के रहिया बतावे के परी।।’’ 
(फूल महुआ के-विनती पृ0-1)

एही विनती से मुक्त जी कऽ गीत-यात्रा शुरू होत बा। कवि-मन ज्ञान कऽ ममत्व रूप से कह रहल बा- ‘कइसे तोहके पाइब माई!’ लेकिन हारत नइखे। मन साहस देत बा-बढ़ावऽ पाँव रास्ता साफ बा, सफलता मिली! आ ऊ हठात रूप धारण कइके प्रभु से कहत बा -

‘‘मह-मह करे जहाँ खिलि के बेइलिया,
सोरिया के नियरा सरपवा के बिलिया,
अइसन विसमता हटावे के परी।
तोहसे नेहिया लागलि बा निभावे के परी।।’’ 
(फूल महुआ के-निभाव के परी पृ0-3)

कइसन विडम्बना बा, ऊपर सुवासित सुमन आ नीचे तरल-गरल धारी सर्प। का विषमता बा। स्पष्ट बा कि मुक्त बील के मूँदल नइखन चाहत बल्कि ओह विषमताकारी तत्व के हटावल चाहत बाड़न। आ ऊ विषमताकारी तत्व खादी ओढ़ले भेड़ियन कऽ बदबूदार नीति हऽ; जवन बिना विरोध कऽ ना हट सकेला। लाठी-डण्डा कऽ प्रयोग करहीं के पड़ी। अगर विरोध ना होई तऽ खून-पसीना कऽ त्याग-बलिदान से मिलल आजादी पर खतरा बा -

‘‘होई ना विरोध तऽ अजदियो बिलाई,
त्याग, बलिदान, मान सब मिट जाई,
फेरु होई जनता लाचार हो,
भोटवा के कारन मोर भइया।।’’ 
(फूल महुआ के-भोटवा के कारन पृ0-111)

ईहे ना मुक्त कऽ गीत में जनता कऽ ऊब आकार लेत नजर आवत बिया। उनका काव्य-संग्रहन में कईगो अइसन गीत बा जवन दिल्ली कऽ दोगलापन पर नजदीक से थूकत बा -

‘‘तिरपन बरिसवा के बीतल समइया,
केहू भइल साँढ़ केहू खूँटा के गइया,
लोगवा हो गइलन कसाई,
बताईं सभे-
कइसे समाजबाद आई?’’ 
(रतिया के भोर-कइसे समजाबाद आई पृ0-30)

आजादी कऽ बाद, छठा दशक आवत-आवत भारतीय जनता कऽ मोहभंग हो गइल। ऊ जवन सपना सँजोवले रहल ऊ पूरा ना भइल। परिणाम ई रहल कि गरीबी, भूखमरी, नैराश्य, कुण्ठा आ संत्रास कऽ नाग आपन फन फइलावे लागल। चारो ओर विषमताजन्य कोलाहल भर गइल। मुक्त जी कऽ एह गीत-पंक्ति कऽ पुष्टि राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ कऽ एगो कविता से बखूबी कइल जा सकत बा -

‘‘शान्ति नहीं तब तक जब तक, सुख मार्ग न नर का सम हो।
नहीं किसी को बहुत अधिक हो, नहीं किसी को कम हो।
जब तक मनुज-मनुज का यह, सुख मार्ग नहीं सम होगा।
शमित न होगा कोलाहल, संघर्ष नहीं कम होगा।।’’

दिनकर जी जवना सुखमार्ग कऽ समता कऽ बात करत बाड़न ऊ कवना राहे आई ई समझ में नइखे आवत। जवना देश में अमीरी आ गरीबी कऽ बीच एतना गहिर खाईं होखे कि डालर अरबपतियन में शुमार मुकेश अम्बानी मुम्बई में एक अरब डालर कऽ 27 मंजिला घर बनववले बाड़न। अपना पत्नी नीता अम्बानी के 250 करोड़ रुपया कऽ निजी हवाई जहाज उपहार में देले बाड़न। उनकर छोट भाई अनिल अम्बानी अपना पत्नी टीना अम्बानी के 400 करोड़ रुपया कऽ लक्ज़री नौका उपहार में देले बाड़न। एकरा ठीक उल्टा दुसरका दृश्य ई बा कि एही भारतवर्ष में एगो रिक्शा चालक आपन खून बेच के अपना बेटा कऽ इलाज करावत बा। एगो गरीब आपन एगो गुर्दा बेच के आपन बेटी कऽ हाथ पीयर करत बा। भारत कऽ ई भयावह आर्थिक विषमता देश के कवना ओर ले जाई सोचे वाली बात बा। एके रोकल शासन-सत्ता कऽ महत्त्वपूर्ण दायित्व हऽ। ‘ए डिस्कोर्स आन पालिटिकल इकोनामी’ में रूसो कहले बाड़न कि-‘‘वैभव की असीमित असमानताओं को रोकना शासन के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कर्त्तव्यों में से है। स्वामियों से सम्पत्ति का अपहरण करके नहीं, बल्कि उन्हें धन एकत्र करने के साधनों से वंचित करके।’’ लेकिन चिन्ताजनक बात ई बा कि अइसन भयावह आर्थिक असमानता पैदा करे वाला अमीरे वर्ग एह देश कऽ नीति-नियंता बा। ईहे वर्ग हमनी के मँहगाई कऽ माने-मतलब समझावत बा। अइसन स्थिति में मिथिलेश गहमरी कऽ ई शेर केतना सार्थक लागत बा कि-

‘‘अमीर-ए-शहर क्या समझायेगा मँहगाई का मतलब,
किसी मुफ़लिस से पूछो कैसे अब घर-बार चलता है।’’

आ ओह मुफ़लिस से पूछे खातिन जब मुक्त जी कऽ कविता केहें गइलीं तऽ ऊ मुफ़लिस कहलस-

‘आहि रे! रऽमऽवा। बिथिकल कहँवा अँजोरिया। आहि रे....!
मँहगी दाबेले नटइया
सिकड़ा हो गइल रुपइया
आहि रे! रऽमऽवा, कवनो चले ना उपइया।। आहि रे....!’’
(लोकरस-बिथिकल कहवाँ अँजोरिया पृ0-19)

‘‘दुखवा के दिनवा ना कटले कटाता, आहि हो दादा!
नाहीं सहले सहाता, आहि हो दादा!
केहू कऽ उठेला इहाँ महला-दुमहला।
टुटही पलनिया में सिसिके सिटहला।
आई समाजबाद बोले ला मलुआ।
झूठे के सपनवाँ देखावेला कलुआ।।
साँच-साँच कहला पर हल्ला बोलाता, आहि हो दादा!’’
(लोकरस-ना सहले सहाता पृ0-18) 

मुक्त जी कऽ ई विवशता हर सचेत आ संवेदनशील व्यक्ति के सोचे बदे विवश करत बा। अइसन स्थिति-परिस्थिति देख के साँच कहला बिना रहियो नइखे जात आ साँच कहला पर हल्ला बोलाए लागत बा। दरअसल एह स्थिति खातिर उत्तरदायी तत्वन कऽ पड़ताल कइल जाई तऽ एगो नया परिदृश्य सामने आई। आज हमनी कऽ पूरा भारतीय समाज एगो अराजक प्रतिस्पर्धी दौर से गुजर रहल बा। आज कऽ समाज में उपभोक्तावादी असंतोष व्याप्त बा। एहिजा हर व्यक्ति एगो अइसन बाजार में खाड़ बा जहाँ खाड़ रहे खातिर लुकाठी हाथ में लेबहीं के पड़ी आ अपने हाथे आपन घर फूँके के पड़ी। ‘घर’ जब ‘बाजार’ पहुँच जाला तऽ घर कऽ नैतिक अर्थवत्ता बिगड़ जाले। ‘बाजार’ ‘घर’ के ‘घर’ ना रहे देला। ऊ सम्बन्ध के ‘लाभ-हानि’ कऽ तरजूई पर तउले ला। हमनी कऽ अतीत अइसन ना रहल हऽ। हमनी कऽ अतीत आ वर्तमान में बहुत बड़ अन्तर बा। हमनी कऽ अतीत ‘जब आवे संतोष धन, सब धन धूरि समान’ कऽ रहे। आ वर्तमान ‘ये दिल माँगे मोर’ कऽ बा। अर्थात् ‘अनन्त कामना’ एगो ‘विकृत अतृप्ति’ कऽ बा; जवन हमनीं के आन्हर खाईं की ओर ले जा रहल बा। आज पुरान मूल्यन के बचावल लाज़मी नइखे रह गइल। ‘नया’ ‘अउर नया’ कऽ इच्छा प्रबल होत जा रहल बा। ‘रीफिलिंग’ नाहीं ‘लिखो और फेंको’ कऽ प्रबल उपभोगी उत्तरआधुनिक विचाराधारा हमनीं के हमनीं कऽ अतीत से तोड़ रहल बा आ जोड़ रहल बा एगो अइसन बाजार से जहाँ रिश्ता-नाता, नेह-छोह के कवनो स्थान नइखे। जहाँ बस ‘माल’ (वस्तु) आ ‘मोल’ (मूल्य) प्रधान होला। मँहगाई आ गरीबी एही सोच-समझ वाली व्यवस्था कऽ उपज हियऽ। एही कुल दारुन दुःख से पीड़ित मुक्त जी कऽ कवि मन नेतन से सीधा सम्वाद् करत नज़र आवत बा -

‘‘सगरे बा रतिया के जोर ए नेता! झूठे देखावेलऽ भोर।
सोना के चिरई के पँखिया कटवलऽ,
मनइन के लूटि धन मोट होइ गइलऽ, 
गगरिन लोर ढरकावे धरतिया -
कहाँ बा देखावऽ तूँ अँजोर ए नेता! 
झूठे देखावेलऽ भोर।।’’ 
(लोकरस-झूठे देखावेलऽ भोर पृ0-25)

भावना जब तीक्ष्ण चोट खा के खुद के विवश महसूस करेले तऽ भीतर कऽ बिरोधी स्वर व्यंग्य कऽ रूप में सामने आ जाला, जवन दुत्कार कऽ जगह पर जयकार करे लागे ला -

‘‘अस्त्र-शस्त्र में बिचवलिया बन 
लूटे वालन के जय हो।
काला धंधा के खातिर 
भूँईं बेचे वालन के जय हो।
दुश्मन के जितावे छल से आपन खुफियन के जय हो।’’
(फूल महुआ के- व्यंग्य- पृ0-101)

अइसने परिदृश्यन कऽ परिणाम रहे कि दिनकर जी कऽ रोष आ घृणा एह स्तर तक बढ़ गइल कि उनका कहे के पड़ल -

‘‘दिल्ली आह! कलंक देश का,
दिल्ली आह! ग्लानि की भाषा।
दिल्ली आह! मरण पौरुष का,
दिल्ली छिन्न-भिन्न अभिलाषा।’’ 

मुक्त जी कऽ दू तिहाई समय महानगरी कलकत्ता में बीतल बा। गाँव कऽ प्राकृतिक छटा पर मुग्ध कवि मन बार-बार अपना गाँव कऽ अमराइयन में कोइल कऽ मधुर कूक, गंगातीर, भोर कऽ ललाई, उषा किरिन कऽ खेल, तरइन कऽ हार गूँथत रात आदि पर जा टिकत बा -

‘गंगा तीरे बसल बाटे गँउवाँ हमार।
भोर के ललइया से खेलेले किरिनियाँ,
रतिया गुँथेले जहाँ तरइन के हार।
उत्तर परदेशवा में पूरुब के ओरिया,
परिजाला गाजीपुर जिलवा हमार।
रेवतीपुर नउवाँ हऽ गँउवन के अगुआ,
गह-गह करे जहाँ अँगना-दुआर।’’ 
(फूल महुआ के- गँउवाँ हमार पृ0-4)

गाँव से असीम प्यार, चिक्का खेलल, पहलवानी कइल आदि एह गीत में मिलत बा। गाँव कऽ प्राकृतिक वातावरण कऽ दृश्यात्मक चित्रण कवि कऽ कोमल भावना कऽ परिचायक बा। एह गीत कऽ दूगो पंक्ति विशेष देखे लायक बा -

‘‘हथवा छोड़ाइ जहाँ जाले लहरिया,
तड़पेला जहवाँ पर बेकल अरार। गंगा तीरे बसल बाटे......।’’

एह दूनो पंक्तियन में प्रकृति कऽ मानवीकरण कऽ अलावे गाँव कऽ अतीत के वर्तमान कऽ सामने रखे कऽ मुक्त जी कऽ पुरजोर कोशिश बा। इहे ना रेवतीपुर कऽ नामकरण-कारण की ओर बखूबी संकेत कइले बाड़न। अरार कऽ भुजबंध झटकि के बेदर्द लहर तऽ चलि गइल लेकिन बेकल अरार अब्बो चमकत आँसू रेत कऽ रूप में सँजो के रखले बा। माओत्से तुंग लिखले बाड़न कि-‘‘वास्तविक जीवन के बदले कऽ क्रम में साहित्य आ कविता में चित्रित जीवन दूर तक उपयोगी होला।’’ मुक्त जी रेवतीपुर कऽ वरिष्ठतम कवि हउवन। उनकर कवितन में रेवतीपुर कऽ बनत-बिगड़त जीवन, गिरत-उठत गाँव लउके ला; जवन गाँव कऽ जीवन, ओकर कार्य-संस्कृति के बदले में सहयोगी बा। कविता कऽ साथे जागे-सुते वाला कवि मुक्त जी अपना गाँव कऽ ऊपर जेतना कविता लिखले बाड़न ओतना कविता शायदे कवनो कवि अपना गाँव पर लिखले होई। उनका गाँव विषयक कवितन में गाँव कऽ दुगो रूप लउकेला। पहिला पुरनमासी कऽ तऽ दुसरा अमवसा कऽ -

‘‘गाँवन में हउवे गाँव हमार, जहाँ कोइलर मधुमास मनावे।
भोरे पपीहा पिहिक रस घोरे, चहकि चिरई फुलवारी में गावे।
आम के बउर पे गूँजे भँवर, महुआ रस कऽ गगरी ढरकावे।
नेही लहर हँसि छेड़े अरार के, भोरे उषा मुसकान लुटावे।।’’ 
(अँजोर-पृष्ठ-2)

एह भोजपुरी सवइया कऽ शब्द-प्रतीकन कऽ लक्ष्यार्थ गाँव कऽ भौतिक, सांस्कृतिक सम्पन्नता बा। चूँकि मुक्त जी कऽ अधिकांश जीवन शहर में बीतल बा, एह से उनके गाँव कऽ दूध धोवल अँजोरिया सोहावन लागत बिया। दूर कऽ ढोल सोहावन होला। दूर रहला पर गँवई परिवेश, गाँव कऽ लोगन कऽ भोला व्यवहार उनके प्रिय लागे। लेकिन जब मुक्त जी गाँवें अइलन तऽ मन कऽ कल्पना-मूर्ति चूर-चूर हो गइल। ऊ गाँव में सोच से कई गुना अधिका अन्हार देखिके चकचिहइलन जइसे पाउडर में छिपल चेहरा पर चेचक कऽ भयानक करिया दाग देख लेले होखँस। गाँव में झूठे कऽ दिखावा, बेईमानी, आपसी बैर आदि कऽ नग्न चित्रण बिना चश्मा लगवलहीं एक साँस में कइले बाड़न-

‘‘कपटी लोगवन के कपटी पियार भइया।
जाके गँउवाँ में देखलीं अन्हार भइया।
नेह नाहीं मतलब कऽ पनपत बा नाता,
केहू कऽ दुअरा केहू नाहीं जाता, 
झूठे-मूठे कऽ खइले बा खार भइया।।’’ 
(फूल महुआ के-जाके गँउवाँ में देखलीं अन्हार भइया-पृ0 93) 

कबो गाँव नेह कऽ प्रधान प्रतीक रहल। मैथिलीशरण गुप्त लिखलन- ‘‘अहा! ग्राम्य जीवन भी क्या है/क्यों न इसे सबका मन चाहे।’’ लेकिन अब उहे गाँव कटुता कऽ प्रतीक बन गइल बा। ओह नेह कऽ डोर में गाँठ पड़ गइल बा-

‘‘जाति-पाँति, छुआछूत अजुओ बा सगरे,
एगो जाति दोसरा केऽ रात-दिन रगरे,
ऊपरा से नीमन बाटे भीतरा दरार रे अरे!
गँउवाँ में चारू ओरिया नाचऽता अन्हार रे अरे!’’
(रतिया के भोर-नाचऽता अन्हार रे पृ0-11)

मुक्त जी गाँव कऽ विस्तृत फलक के जेतना शीर्षकन में पकड़े कऽ कोशिश कइले बाड़न ओमें ‘नाचऽता अन्हार रे’ गाँव पर अइसन गीत बा जेके गाँव कऽ गीत ना कहि के गाँव कऽ ‘एक्स-रे’ कहल उचित बा। एह गीत में गाँव कऽ नंगापन के नज़दीक से देखले-देखवले बाड़न। मुक्त जी कऽ एह गीत में रे , अरे कऽ सम्बोधन उनका संवेदना कऽ उच्च दर्जा के दर्शावत बा। रे, अरे, आहो, हे माई, ए काका, चाचा, भइया के सम्बोधित कऽ के मुक्त जी कऽ कविता लिखला क मतलब ई भइल कि एगो दूसरा व्यक्ति के साक्षी भाव में खड़ा कऽ के बुराई-अच्छाई के जगजाहिर कइल; अपना पीर कऽ प्रामाणिक प्रस्तुति। एइसन काम अगर सबसे ज्यादा केहू कइले बा तऽ कबीरदास। ‘संतो भाई! आई ज्ञान की आँधी।’, ‘साधो! देखो जग बउराना।’, ‘पाड़े! कवन कुमति तोहें लागी।’.....आदि। मुक्त जी कऽ संवेदना कबीर कऽ ओह ऊँचाई तक पहुँच जात बा जहाँ पहुँच के कविता पंक्ति अनुसिद्ध सूक्ति बन जाले। 

कवि प्राण-प्रियतम के पत्र लिख-लिख के थकि गइल बा। ऊ विश्वासघाती ना जाने कवना सुख में बा; जे स्नेह-संलिप्त प्राणवर्तिका कऽ अनवरत जरलो पर नइखे आवत। कवि कऽ अन्तरात्मा विरह वेदना से कराहि उठत बिया- जे बात दे के भुला जाला ऊ संघाती ना हो सकेला; हे मन! अब हम नेह पाती का लिखीं-

‘का लिखीं हम नेह पाती।
बहुत लिखि के थकि गइल मन,
उमड़ि आइल फेनु दृग-घन,
दिन कइसहूँ बीति जाला-
रात में होला विकल मन, 
याद उनका के करीं का-
फटि रहल कमजोर छाती। 
का लिखीं हम नेह पाती।।’’
(फूल महुआ के-का लिखीं हम नेह पाती, पृ0-20)

‘दृग-घन फेनु उमड़ि आइल’ एकर मतलब बा कि कवि कऽ ई प्राथमिक पीर ना हऽ बल्कि एह से पहिले ऊ निर्मोही कई बेर पीर दे चुकल बा। निश्चित रूप से कवि कऽ अन्तरमन कबो कजरार पावस कऽ प्रतीक्षा कइले होई, लेकिन जवन छहा-छोह बारिस कऽ मन में आस सँजोवले होई ऊ चूर-चूर हो गइल होई; प्राण पपीहा पियसले रह गइल होई। चिर् प्रतीक्षित फल ना मिलला कऽ परिणाम ई भइल कि कवि कऽ आँख त आँख, आँसू भी थकि गइल -

‘‘थकि गइल बरिसत नयन जल,
आस के पंछी पराइल।
घिसि गइल अँगुरी गिनत दिन,
सुख सपन लेखा बुताइल।
नाग अइसन बिरह-बिखिधर साध के अपना गइल डँस।
आगइल कजरार पावस।।’’
(फूल महुआ के-आगइल कजरार पावस, पृ0-24)

20वीं शताब्दी कऽ चिंताकारन से एगो बहुत बड़ भूल हो गइल बा कि ऊ लोग मनुष्य के मात्र सामाजिक प्राणी कहि के ओके गुमराह कइले बा। मनुष्य खाली सामाजिक प्राणी ना हऽ बल्कि ओह से ज्यादा ऊ प्राकृतिक प्राणी हऽ। गीतकार मुक्त कऽ प्रकृति प्रेम हर गीत में लउकत बा जवन उनका पूर्णता कऽ परिचायक बा-

‘‘बरिया में बउराइल बहकल बसन्ती,
बहकि-बहकि गावेले होली।
सरसो कऽ मथवा से छीने पगड़िया,
लतिका के लूटेले चोली।
रसिया भँवरवा के रहिया में छेड़े,
बोलेले बोली-कुबोली।’’
(फूल महुआ के-बसन्ती, पृ0-29)

‘‘देखि के रइनिया के, भागत सेजरिया से,
खुखु-खुखु हँऽसेला रे! बिहान।
देखि के अँजोरवा के, भागेले तरइया से,
छिपि जाला लजिया से रे! चान। 
ललका मुरेठा बान्हि, भोर के कुअँरवा से,
उषा के निहारेला रे! मुसुकान।’’ 
(रतिया के भोर-खुखु-खुखु हँऽसेला रे! बिहान, पृ0-13)

मुक्त जी कऽ ई प्रकृति-प्रेम सराहे जोग बा। प्रकृति प्रेम राष्ट्र प्रेम कऽ एगो दूसर रूप हऽ। अगर अदमी प्रकृति से प्रेम नइखे करत तऽ ई समझेके चाही कि ऊ राष्ट्र से प्रेम नइखे करत। डॉ0 वासुदेवशरण अग्रवाल लिखत बाड़न कि-‘‘भूमि के भौतिक रूप सौन्दर्य और समृद्धि के प्रति सचेत होना हमारा आवश्यक कर्त्तव्य है। भूमि के पार्थिव स्वरूप के प्रति हम जितने अधिक जागरित होंगे उतनी ही हमारी राष्ट्रीयता बलवती हो सकेगी। यह पृथ्वी सच्चे अर्थों में समस्त राष्ट्रीय विचारधाराओं की जननी है, जो राष्ट्रीयता पृथ्वी के साथ नहीं जुड़ी वह निर्मूल होती है।’’ नदी-नाला, पेड़-पौधा, पहाड़, लहलहात धान कऽ खेत, सावन-भादो, मोर-पपीहा आदि कऽ आतुर-प्रसन्न मुद्रा में वर्णन करे वाला मुक्त जी के सही मायने में राष्ट्रहित-चिन्तक कहल जाई। उनकर पूरा कविता-संसार प्रकृति-वर्णन से भरल बा। हमरा अचरज तब भइल जब नामवर िंसंह जी जइसल आलोचक ‘प्रकृति कऽ सुकुमार कवि’ सुमित्रानन्दन पंत कऽ 75 प्रतिशत साहित्य के कूड़ा कहलन। आज पूरा विश्व में ई चिन्ता कऽ विषय बा कि साहित्य से हरियाली, चिरइन क चहक, पानी, नदी, पहाड़, फूल-पत्ती गायब हो रहल बा। अगर हिन्दी में प्रकृति के सबसे ज्यादा संरक्षित कवनो कवि कइले बाड़न त ऊ पंत। पंत जी हिन्दी कऽ अइसन कवि हउवन जिनका कविता में प्रकृति खातिर पुनीत हित-चिन्ता लउके ला। आज जंगल के काट के कंकरीट कऽ जंगल मतलब ई कि बहुमंजिली बिल्डिंग बनावल जात बा; नदी के बान्ह के बिजली बनावल जात बा; हवा के प्रदूषित कइल जात बा; खेत कऽ उर्वरता कऽ दोहन कइल जात बा। एकर परिणाम अब साफ नजर आ रहल बा। अब पृथ्वी अपना पुत्रन कऽ कइल अप्राकृतिक काम कऽ विरोध करे शुरू कऽ देले बिया। फैलिन, कैटरीना, सुनामी, उत्तराखण्ड कऽ खण्ड प्रलय, अतिवृष्टि, अनावृष्टि आ ग्लोबल वार्मिंग कऽ रूप में धरती माई कऽ खुनुस हमनी कऽ सोझा आ रहल बा। दैहिक भोग खातिर बेहद आकृष्टता, वैभव खातिर जबरदस्त लोलुपता अदमी के बेहद स्वार्थी बना देले बा। आज अदमी स्वार्थबोध से ग्रस्त बा। ओकरा में परमार्थी भावना तनिको नइखे लउकत। ‘निजहित’ खातिर प्रकृति कऽ अहित कइल ‘अभिनव मनुष्य’ कऽ स्वभाव बन गइल बा। ‘युगवाणी’ में पंतजी कऽ एगो कविता बा कि-

‘‘देखो भू को,
स्वर्गिक भू को,
मानव पुण्य-प्रसू को।’’

पंतजी, ‘पुण्य-प्रसू’ एह धरती के देखे के, बचावे के, एके संरक्षित करे के गोहार करत बाड़न। 1977 में लिखल ‘संक्राति’ शीर्षक कविता में पंतजी बाहरी विभव से अन्तर कऽ वैभव के महत्त्वपूर्ण मानत लिखत बाड़न-

‘‘वहिर्विभव से कहीं महत अन्तर का वैभव,-
स्वार्थ सिद्धि से कहीं श्रेष्ठ भवजीवन अनुभव!
वस्तु-भोग के पीछे भू नर मत हो पागल
भव विकास का क्षेत्र भविष्यत भू का उज्ज्वल।’’

प्रत्यक्ष आ परोक्ष रूप से धरती कऽ प्रति अइसन उदात्त भाव राखे वाला पंतजी कऽ साहित्य कऽ 75 प्रतिशत अगर नामवर सिंह जी के कूड़ा लागत बा तऽ इहे कहे के पड़ी कि हे ईश्वर! नामवर दादा के सुमति दऽ। उनके ई बतावऽ कि एकांगी मार्क्सवादी दृष्टिकोण पूरा धरती खातिर ‘शुभद’ नइखे। 

मुक्त जी कऽ चारो गीत-संग्रह में आत्म-चेतना कऽ उदात्त अवस्था परिलक्षित होत बा, जवन समकालीन भोजपुरी गीतकारन कऽ शीर्ष-सरणी में एह कवि गीतकार के पहुँचा देति बा। अपना गीत में मुक्त जी तमाम प्राकृतिक उपमानन में चाँद से ज्यादे प्रभावित बाड़न-‘रात में किलोल करे चाँद से चँदनियाँ’, मनवाँ के चँनवाँ डुबल जाला हो, हमार देशवा ए रामा’, ‘रतिया में हँसी कइसे सुखवा के चाँन/कइसे होई फेनु देशवा में सोना के बिहान’, ‘चँनवा से रतिया उतारेले अरतिया’, ‘देखि हँसि सरकेला चाँन’, ‘जइसे धरतिया चनरमा के चमके’, ‘तोहके चन्द्र खेलवना देइब’ इहे ना एह चारो संग्रहन में मुक्त जी अन्हारो पर पाँच सेल कऽ टार्च बरले बाड़न, जवन अन्हार उनका विकलता कऽ मुख्य कारन बा- ‘फन फइलवले बा रतिया कऽ नगवा’, ‘जाके गँउवाँ में देखलीं अन्हार भइया’, ‘तोहके देखते अँजोरिया अन्हरिया भइल’, ‘ए धरतिया पर कतहूँ ना लउके अँजोर/सुरसा रइनियाँ बढ़ावे आपन मुँहवाँ/देखि के दुबुकि गइल भोर’, ‘जुगुनू से भागी का अन्हार’, ’अन्हियारी बा ई अइसन जे कतहूँ कुछउ लउके नाहीं’, ‘दिनवाँ के लील गइल रतिया पिशाचिन/सिसके अन्हरिया में धरती अभागिन’।

अन्हार से बेकल मुक्त जी सूरज के बोलावा तऽ भेजत बाड़न लेकिन ऊ आवे में देर कऽ रहल बाटे, तब तक कवि के चाँन कुछ राहत दे रहल बा; लेकिन ओके ऊ स्थायी नइखन मानत। ऊ प्रतीक्षा आ खोज जारी रखले बाड़न। खोज आ यात्रा में बहुत बड़ अन्तर बा। खोज फूल से जड़ तक जाले आ यात्रा तना से शुरु होके फूल तक रहि जाले। अधिकतर कवि लोग अपना काव्य-चिन्तन में खोज ना कऽके यात्रा करेलनजा आ अन्त तक एह भरम में पड़ल रहेलन जा कि जवन हम कइले बानीं ऊ खोज हऽ; ऊहो एकदम नया। कुल मिलाके मुक्त जी अपना एह चारो संग्रहन में खोज में अनवरत प्रयत्नशील लउकत बाड़न। 

राष्ट्रप्रेम कवि सोच कऽ कसौटी होला। ओही पर ओकर चिन्तन परखल जाला। जवना कवि कऽ कविता में राष्ट्रप्रेम परिलक्षित ना होला ऊ कवि कहाए कऽ लायक नइखे। जवन गीतकार दू-चार छन्द राष्ट्र के समर्पित नइखे कइले ऊ गीतकार का बा। राष्ट्रप्रेम कऽ कसौटी पर खरा उतरे बदे पहिलकी शर्त ई बा कि कवि कऽ कविता में अतीत कऽ प्रति प्रेम आ भविष्य कऽ प्रति चिन्ता लउके-

‘‘कहाँ झूला झूले गाइ कजरी सवनवाँ,
बिरहा कऽ तान छेड़े कहवाँ किसनवाँ,
सूर, मीरा, तुलसी अइसन कहाँ गीतकार बा।
कतहूँ ना लउके जइसन देसवा हमार बा।।’’
(फूल महुआ के-देसवा हमार बा, पृ0-80)

एह गीत में अतीत कऽ प्रति अगाध प्रेम मुक्त जी कऽ राष्ट्रप्रेमी होखे कऽ परिचय देत बा। अब भविष्य कऽ प्रति गीतकार कऽ मरम के छूवे वाली विकलता भरल चिन्ता देखल जाव-

‘‘बहत बिया नइया नादान बा खेवइया,
ना जानीं लागी कवना ओर,
ए धरतिया पर कतहूँ ना लउके अँजोर।’’ 
(फूल महुआ के-कतहूँ ना लउके अँजोर, पृ0-99)

‘‘उठऽताटे ऊँचका तुफनवाँ
बचाके चलू भइया रे मलहवा!
फन फइलवले बा रतिया कऽ नगवा,
देखऽता तमाशा दूर ठाढ़ होके जगवा,
टूटि-टूटि गिरऽता अररवा।
बहरो आ भितरो से उठे हिलकोरवा,
कहाँ गइल भोर कहाँ दुबुकल अँजोरवा,
कसि के सम्हारू पतवरवा।’’
(फूल महुआ के-भइया रे मलहवा, पृ0-89)

एहिजा खतरा एकतरफा नइखे, बल्कि बहरी आ भीतरी दुनों बा। एह स्थिति-परिस्थिति में अगर पतवार के सही सम्हार आ नाव के सही दिशा ना दियाई तऽ निश्चित रूप से राष्ट्र रूपी ई नाइ डूबि जाई। टी0एस0 इलियट कऽ ‘वेस्टलैण्ड’, मुक्तिबोध कऽ ‘अंधेरे में’, धूमिल कऽ ‘पटकथा’ कऽ साथे अगर मुक्त जी कऽ एह चारो कविता-संग्रह के पढ़ल जाव तऽ ई देखे के मिली कि एह कवितन में जवन मूल चिन्ता उभर के सामने आइल बा ऊ बा ध्वंस, बिखराव, टुटला आ छुटला कऽ मर्मान्तक पीड़ा। लेकिन जहाँ टी0एस0 इलियट कऽ पीड़ा युद्ध-जनित बा ओहिजे मुक्तिबोध, धूमिल आ मुक्त कऽ पीड़ा देशी-विदेशी शोषण बा। 

‘‘अब तक क्या किया/जीवन क्या जिया/बताओ तो किस-किस के लिए 
तुम दौड़ गए/करुणा के दृश्यों से हाय/मुँह मोड़ गए/बन गए पत्थर/
बहुत-बहुत ज्यादा लिया/दिया बहुत-बहुत कम/मर गया देश,अरे, 
जीवित रह गए तुम।‘‘ 
मुक्तिबोध (अंधेरे में)

‘‘गोदाम अनाज से भरे पड़े थे और लोग/भूखों मर रहे थे/मैंने महसूस किया
कि मैं वक्त के/एक शर्मनाक दौर से गुजर रहा हूँ/अब ऐसा वक्त आ गया है
जब कोई/किसी का झुलसा हुआ चेहरा नहीं देखता है/अब न तो कोई किसी का
खाली पेट देखता है/न थरथराती हुई टाँगें/और न ढला हुआ ‘सूर्यहीन कन्धा’
देखता है/हर आदमी, सिर्फ, अपना धन्धा देखता है।’’ 
धूमिल (पटकथा)

‘‘कहाँ जाईं राम, कवनि-कवनि गली भटकीं।
रतिया कऽ दिनवाँ से बढ़ि के चलति बा,
छोटकी के बड़की मछरिया लिलति बा,
गिरगिटवा मारत बा तितलिन के मटकी।’’
(रतिया के भोर- कवनि-कवनि गली भटकीं, पृ0-46)

एह कविता में जवन गिरगिट बा ऊ जब प्रतीक से बाहर निकलत बा तऽ देखल जाव कवना रूप में लउकत बा -

‘‘छुआछूत जाति-पाति भेद-भाव बो के,
मंत्री जी मुसुकालन एक ओर हो के,
चभिहन मलाई जब आग अउर चटकी,
कहाँ जाईं राम, कवनि-कवनि गली भटकीं।"
(रतिया के भोर- कवनि-कवनि गली भटकीं, पृ0-46)

एह तीनों कवितन में रचना समय कऽ अन्तर बा लेकिन पीड़ा में समानता बा। आज तक देश कऽ हालत में कवनो खास सुधार नइखे भइल। मुक्त जी कऽ एह तमाम गीतन के देखला पर एगो बात साफ नजर आवत बा कि उनका में कबीर नियर विद्रोह कऽ बेचैनी आ तुलसी नियर गहिर सृजनात्मक चिन्ता विद्यमान बा, जवन उनका के भोजपुरी कऽ समकालीन कवियन से अलगा पुरहर पोढ़ स्थिति में खड़ा करत बिया।

एगो सजग कवि कऽ नजर एतनी पैनी होखे के चाही कि ऊ समाज कऽ कुरीतियन के खोज-खोज के खतम करे। मुक्त जी कऽ पैनी दृष्टि सुरसा कऽ समान मुँह फइलवले दहेज के भला कइसे बकस देई। मुक्त जी कऽ ‘परबतिया’ दहेज रूपी सुरसा कऽ ग्रास बनिके रो-रो के आपन ब्यथा-कथा सुनावत बिया -

‘‘जवन कुछ रहे बाबा बेंच-ऊँचि देहलन।
घरओ-दुअरओ के गिरवी धऽ दिहलन।
तबो नाहीं पसिजल न आइल बरियतिया।
सुनावे लागल ना आपन बीतल परबतिया।।’’
(फूल महुआ के- परबतिया- पृ0-87)

दहेज आज मुँह फाड़ि के समाज में खड़े नइखे बल्कि ऊ झपटि-झपटि के बेकसूरन के निगलत बा। एकरा बिरुद्ध में नवयुवक वर्ग जब तक सचेत होके युद्ध ना करी तब तक ई ना मरी। मुक्त जी एह कुरीति के सबके मिलि के मिटावे बदे ललकारत बाड़न -

‘‘अजगर दहेजवा के मारि के मिटावऽजा,
अपना लइकियन के भइया बचावऽजा, 
मिलि के मिटावऽजा समाज कऽ कुरितिया,
सुनावे लागल ना आपन बीतल परबतिया।।’’ 
(फूल महुआ के- परबतिया- पृ0-87)

कवि मुक्त में साधारण शब्दन कऽ सुगठन से असाधारण अर्थ-व्यंजना करेकऽ क्षमता बा। सही अर्थ में कहल जाव तऽ कविता कम से कम शब्दन में कइल जीवन कऽ सटीक समीक्षा हियऽ। आज स्वस्थ मनबोध कऽ साथे अपना समय-समाज कऽ सम्यक् समीक्षा करेकऽ क्षमता कवनो भोजपुरी कवि कऽ कविता में लउकत बा तऽ ऊ मुक्त जी कऽ कविता में। उनका वैचारिकी कऽ मूल आधार उनकर प्रबल जनपक्षधरता बा। जवन उनका गीतन के जीवन्तता प्रदान करत बा। एगो अउरी बात- मुक्त जी कऽ गीतन के पढ़त समय एगो नया आस्वाद, एगो नया रसायन मिली। उनका कवि में पुरान विषय-वस्तु के नया ढंग से सहज भाषा में सामान्य प्रतीक आ बिम्ब कऽ सहारे परोसे कऽ क्षमता बा। 

‘‘नीचे माथ ऊपर लोगवन के पाँव हो गइल। 
का बताइंर् अब कइसन आपन गाँव हो गइल।।’’
(रतिया के भोर)

‘‘ हारि गइल हंस सहजे जीति गइल कउवा।
भुलाई नाहीं जिनगी भर गाँव के चुनउवा।।’’
(रतिया के भोर) 

कविता के एगो पूर्ण कविता बने खातिर ई जरूरी बा कि ‘कवन बात लिखल जाव’ आ ‘बात के कइसे लिखल जाव’ अर्थात् रचना में कथ्य आ शिल्प कऽ संतुलन बरतल जरूरी बा। हिन्दी में द्विवेदी युग (जागरण सुधार काल) कथ्य-इतिवृत्ति प्रधान काल रहे तऽ प्रयोगवाद शिल्प प्रधान हो गइल। पहिला युग कऽ विरोध में ‘छायावाद’ आइल तऽ दुसरा कऽ विरोध में ‘नई कविता युग’। भोजपुरी कविता खातिर आज ई जरूरी बा कि ऊ एह दूनों अतिवादिता के छोड़के बीच कऽ रास्ता अपनावे। भोजपुरी कऽ 70 प्रतिशत कविता ‘‘डेल सो बनाय लाय मेलत सभा के बीच लोगन कवित्त कीनो खेल करि जानो है।’’(ठाकुर) वाली स्थिति में बाड़ी सऽ। ई स्थिति भोजपुरी खातिर सुखद नइखे। भोजपुरी कविता के एह मानक पर खरा उतरे के होई कि-‘‘पंडित और प्रवीनन को जोइ चित्त हरे सो कवित्त कहावे।’’ (ठाकुर) चाहे ‘‘दास कवित्तन की चर्चा बुधिवन्तन को सुख दे सब ठाईं।’’ (भिखारी दास)। एगो अल्हड़ गँवार कऽ कविता सुनला-पढ़ला आ पंडित-प्रवीन-बुधिवन्त कऽ कविता सुनला-पढ़ला में अन्तर होला। कविता कऽ जवना मर्म तक बुधिवन्त पहुँची ओहिजा गँवार ना पहुँची। भोजपुरी कवि लोग के एह बिन्दु पर स्वस्थ विचारणा कऽ जरूरत बा कि उनकर कविता न तुलसीदास कऽ ‘हनुमानचालीसा’ बने न मुक्तिबोध कऽ ‘ब्रह्म राक्षस’। हिन्दी प्रयोगवादी कवि अजित कुमार कऽ ई नाबालिक जिद-‘‘चाँद को चन्दन सदृश हम क्यों लिखें/मुख हमें कमलों सरीखा क्यों दिखे/ हम लिखेंगे/चाँद उस रुपये के समान है/जिसमें चमक है पर खनक गायब/मुँह घर अजायब/जिसमें बेतुका, अनजान, मुर्दा और जिन्दा भाव रहते हैं।’’ आ अज्ञेय कऽ ई खोखला एलान-‘‘और ये उपमान मैले हो गए हैं/देवता इन प्रतीकों के कर गये हैं कूच/बासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है।’’ हिन्दी कविता के दुर्गति कऽ गर्त में ढकेल दिहलस। भोजपुरी कविता एह दुर्गति से बचल बिया। पूरा भारतवर्ष कऽ हर भाषा कऽ कवितन के देखल जाव तऽ सबसे अधिक छान्दसता (छन्द में कविता रचे कऽ प्रवृत्ति) भोजपुरी में बचल बा। कविता कऽ छान्दस प्रवृत्ति कविता के लमहर उमिर देले। मुक्त जी कऽ एह चारो काव्य-संग्रह में एक्को अतुकान्त-मुक्तछन्द प्रवृत्ति कऽ कविता नइखे। मुक्त जी कऽ छान्दसता के अउर गहराई से समझल जाई तऽ बात ई सोझा आई कि जब मस्तिष्क विचार-शून्य स्थिति में आवेला तऽ छन्द कऽ छान्दसता महत्त्वहीन हो जाले। एह स्थिति में मस्तिष्क कऽ लघुत्व बोध समाप्त हो जाला आ कवि अइसन विराटता में निमज्जित हो उठेला जवन एगो नया एहसास जगा देला; भाव तरल अमृत बनिके लयात्मक भाषा कऽ माध्यम से गीत कऽ रूप ले लेला। इहे गीत मुक्त जी कऽ अभिव्यक्ति कऽ मूल विधा हऽ। इहे ना भोलानाथ गहमरी कऽ ‘अँजुरी भर मोती’, ‘बयार पुरवइया’ आ ‘लोकरागिनी’ कऽ बाद लोकरस-राग कऽ संरक्षा कऽ विराट- वन्दनीय प्रयास कवनो गीतकार कऽ गीतन में मिलत बा तऽ ऊ मुक्त जी कऽ गीतन में। उनका चारो भोजपुरी काव्य-कृतियन में कजरी, चइता, सोहर, पिंड़िया, होरी, फगुआ, धोबियऊ, गांड़ऊ, बियाह, पुरबी, पचरा आदि कऽ साथे शास्त्रीय लय-छन्द जइसे कवित्त, सवइया, दोहा आदि कऽ सहज-सुन्दर प्रयोग देखे के मिलत बा। 

एह तमाम वर्णन में एगो बात ध्यान देबे जोग बा, ऊ बा मुक्त जी कऽ गहिर काव्यात्मक निर्लेप दृष्टि। युगधर्म कऽ त्रासद वर्णन में गहिरा उतरे में एही से ऊ सफल भइल बाड़न। काहें कि ऊ कवनो राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक आ व्याकरणिक जकड़न में बँधल नइखन। ऊ शुद्ध मानवीय दृष्टि हर स्थिति-परिस्थिति में बनवले रहत बाड़न। मुक्त जी खाली बाहरी संसारे कऽ प्रति सचेत नइखन बल्कि व्यक्ति कऽ अंतरंग जीवन में बखूबी पइठल बाड़न। मस्तिष्क कऽ खौफनाकियत, हृदय कऽ जटिलता आ सड़ियल प्रेम, एह सबसे मुक्त जी हर जगह मुक्त रहे बदे क्रियाशील बाड़न। इनकर प्रेम सहज घरेलू प्रेम बा। इनकर विचार कहीं से आयातित नइखे। मुक्त जी बन्द कमरा कऽ व्यक्ति नइखन। एही से उनका में विचार-निजता कऽ पहिचान बनल रहत बा। निश्चित रूप से इनकर गीत आवे वाला समय खातिर ठोस भूमिका बा; जेकरा आधार पर समग्र स्वस्थ भोजपुरी कविता-गीतन के उगे-बढ़े आ फूले-फरे कऽ अवसर मिली। मुक्त जी कऽ ‘मुक्तता’ एकर मनोभूमि होई। 
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लेखक परिचय:-

नाम: डॉ. अक्षय कुमार पाण्डेय
पता: रेवतीपुर (रंजीत मुहल्ला) 
गाजीपुर-232328 (उ
प्र
.
)
मो. नं. - 09450720229
ईमेल: akshaypandey00@gmail.com

अंक - 81 (24 मई 2016)

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