संपादकीय

देस आ दासा - सौरभ पाण्डेय

मन चिहुँकेला, सोचे बेबाती
जे लोग राग कइसे लगइहें..
मन खउँझेला अन्हरे-पराती
जे जोग भाग कइसे जगइहें.. 

देस के आने प जिनगी चलौनीं
सीमा प पवनी, उ गाँवें गँवौनी
हठ पारेला भुइँयाँ रेघारी
तिरंग सान कइसे बढ़इहें.. 

पेरत दासा देखावे तमासा
छनहिं में तोला, त छनहिं में माशा
मन भटकेला बउड़म-देहाती
उतान नाँव कइसे करइहें.. .

चाह-उमीद घोंसारी लगावे
हाल बेहाल बवाल मचावे
सुख लउकेला सहिजन-डाढ़ी
खयाल बाग कइसे सजइहें.. . 

आँखे तरेगन जोन्हीं जियाईं
सपना सजाईं त काया गँवाई
बड़ कचकेला कहँरत काठी
कि आहि लाग कइसे लगइहें.. . 

जीयऽत सूगा उँघाइल कँछारी
सिरदल मनवाँ सँजोए बेमारी
जब दँवकेला साढ़हिं-साती
उपाइ लोग कइसे सुझइहें.. 
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अंक - 80 (17 मई 2016)

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