संपादकीय

चइता पर युवा व्यास सुबोध वर्मा से भेंट वारता: जनकदेव जनक

'कंठे सुरवा होख ना सहइया हो रामा, कंठे सुरवा......'

युवा व्यास सुबोध वर्मा भोजपुर जिला के बागा गांव, थाना अंजीबाबाद के निवासी बानी. झारखंड राज्य धनबाद जिला के लोदना क्षेत्र के साउथ तिसरा परियोजना में बीसीसीएल कर्मी बानी. बचपने से गीत गवनई के सौकिन रहे. अबहीं चइता गायन के उत्थान आ प्रगति में इहां के जोगदान अबेवसायिक रहल बा. चइता गायन के अलग अलग रसों के बारे में उहां से बतकही के कुछ अंश रउरा सभे के सामने प्रस्तुत बा.
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जनकदेव जनक: हम जाने के चाहत बानी कि चइत मास में चेइता के का महातम बा? 

सुबोध वर्मा: श्रीराम जन्म के साथे चइता के लोक राग जुड़ल बा. चइता के दउरान बधाई से लेके झुमर तक गावल जाला. भर चइत माह चइती आ चइता गायन के बहार छइले रहेला. चैत के अरथ मधु होला. मधु ना गलेला ना सड़ेला. उ त अमरत्व के प्रतीक ह. जवन बसंती चइत मास में प्रकृति से उत्पन्न होला. पलास के लालटेस फूल, आम के अमराइयन में मधुआइल मोजर, होत भिनुसारे महुआ गाछ से चुअत टप टप महुआ के फूल. ई सब रसदारे होला. जवन उल्लास आ उमंग के प्रतीक ह. एही मास में चइती नवरात, चइती छठ, राम नवमी आ सरहुल पर्व मनावल जाला. 

जनकदेव जनक: रउरा गांवे चइता कब शुरू भइल रहे? 

सुबोध वर्मा: आरा (भोजपुर) जिला के बागा गांव में चइता गवनई सन 1906 से शुरू भइल रहे. एकर शुरूआत गांव के पुरान मठिया पर स्वर्गीय बजरंग दास महंथ के देख रेख में दु गोला चइता से भइल रहे. ओकरा बाद से गांव के परंपरा बन गइल. अब त बिहार सरकार के देख रेख में चइता होत आवता. फगुआ के राते में चइता के सगुन हो जाला.जब चइता के लय आ ताल पर नचनियन के ठूंमका लागेला त लोग गेहूं के कटनी के थाकावट भूल जाला. रात में चइत के मातल पुरवा बेयार देह के लसलसा दिले. गीत के बोल पर दरशको मदहोश हो जाले. नागिन खानी बलखात नचनियान के आगे पीछे कमर बेना लेखा डोलावे लागेला लोग. काहे कि चइता में मधुरस होला त उ मीठ होखबे करी. 

जनकदेव जनक: रउरा गांव में चइता के परंपरा अब के निभावता? 

सुबोध वर्मा: देखी पहिले के अपेक्षा गीत गवनई पर लोग कम धियान देता. बाकिर तबो गांव के स्व. रामउमेश सिंह के दलान,शिवविनय सिंह के दलान, चंद्रिका सिंह के दलान आ देवी स्थान पर आजो लोक गायन के परंपरा जीवित बा. गौतम व्यास, अवधेश व्यास, टनटन ढोलकिया, मदन राम, दामोदर, विक्रमा सिंह, डंडी बाबा, सूर्यदेव राम आदि परंपरा के बचा के रखले बा लोग.

जनकदेव जनक: अच्छा, ई बताई कि चइता गायन में कवन कवन साज बाज के जरूरत पडे़ला?

सुबोध वर्मा: देखी, अलग अलग व्यास अपना रूचि आ साधन के अनुरूप साज बाज राखेलें, जेमें ढोलक, नाल, हरमुनिया, करताल, झाल, खिट, ताशा, घइला आदि प्रमुख बा.

जनकदेव जनक: दु गोला चइता कइसे होला?

सुबोध वर्मा: चइता करावे खातिर खेल के मैदान चाहे एगो शामियाना खड़ा करे लायक जमीन होखे के चाही. जहां दुनू गोल के एक एक व्यास के साथे 30-40 लोक कलाकार बइठ सकस आ असानी से अपना साजो समान के उपयोग कर सकस. ओह कलाकरान के पीछे गली बनल रहेला, जवना में पांच छह गो नचनिया नाच सको.

जनकदेव जनक: एके लय आ ताल पर चइता गायन होला का? एह से त देखनिहारन के मन उबिया जात होई?

सुबोध वर्मा: ना अइसन बात नइखे. गवनई के दउरान दुनू व्यास के बीच मधुर आ सरस हास्य व्यंग्य. होत रहेला, जवन देखनिहारन के मन बुताबिक होला. व्यंग के पुट गुदगुदावत मन के खुश कर देला. एकरा अलावा मनोरंजन में नचनियन पावटी भी कमाल ढाहे ला. कहल गइल बा कि भोजन में चटनी अचार होखे त खाये के मजा कुछ आउर होला. अइसहीं चइता में व्यंग के चासनी बहुते जरूरी बाटे.

जनकदेव जनक: का चइता में विरहीन के दरद वेदना के बखान होला?

सुबोध वर्मा: चइता त सबरंग आ सबरस के मिलल मधु के घइला ह. एगो विरहीन के मन के पेड़त दरद के बानगी देखी, ‘पिया परदेस देवर घर नाहीं, केकेड़ा से कहीं मनवा के बतिया हो रामा....., उठे ला चइत में दरदिया हो रामा, पोरे पोरे.....,’ वही जा दुसर गीत में नायिका अपना देवर के चुहलबाजी से रंज बिया. अपना पिया से शिकायत के लहजे में कहतिया,‘महुआ बिनन हम ना जाइब हो रामा, देवरू के संगवा....,’ गांव के गोरिया के पोर पोर में प्रकृति रंग उफान पर बा. श्रृंगार रस के एगों बानगी,‘ सोभेला इंगुरा टिकुलिया ए रामा, लिलरे पर...., लागल बा खेत में गेहूं के कटनिया, लागता घाम ए राम..., छाता लेले अइह....’ आदि गीतन पर दरशक का रोम रोम प्रफुल्लित होखेला.
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लेखक परिचय:-

पता: सब्जी बगान लिलोरी पथरा झरिया,
पो. झरिया, जिला-धनबाद 
झारखंड (भारत) पिन 828111,
मो. 09431730244

अंक - 76 (19 अप्रैल 2016)

2 टिप्‍पणियां:

  1. बेजोड़ जानकारी। उम्दा साक्षात्कार। जनक जी आ वर्मा जी के आभार। राजीव भाई के साधुवाद।

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