संपादकीय

द चक्कू - देवेन्द्र आर्य

मोरे सइयाँ गये हैं बजार 
चक्कू लावै को।

चक्कू ले अइहैं तो तुमका बतइहें
मोरे सइयाँ खोजे उधार
चक्कू लावे को।

चक्कू रखे से रोब पड़त है
सइयाँ बेचि आये अंगना-दुआर
चक्कू लावै को।

हवा-बतास, न रोटी पानी
खेतन में लोटें सियार
चक्कू लावै को।

लउटे तो हाथन में पट्टी बंधी थी
उंगली कटी देखन में धार
चक्कू लावै को। 

देखी-देखा सइयाँ के सब लइ आए
हुई बस्ती में चक्कू की मार
चक्कू लावै को।

बस्ती उजडि़ गई, दुई जने बसि गए
शहरी लाला अउर जमींदार
चक्कू लावै को।

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