संपादकीय

फगुआ अउरी चइता मिल बनेला काशी - अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"

बिहू, उगाडी, बैशाखी, गुड़ी पड़वा, चइता भा चैत्र नवरात्री। देखल जाव त ई सभ परब सनातन संस्कृति कऽ साल कऽ पहिला महीना हऽ। सनातन संस्कृति के इहे विशेषता बा कि एकरा भीतर कई गो सभ्यता बसल बा अउरी हर सभ्यता के आपन-आपन परबो बा बाकि सभ एगही दिन भा महीना में मनावल जाला। वइसे त सनातन धरम के हर महीना के आपन-आपन महातम बा बाकि चइता भा चैत्र के विशेष महातम एह से भी हो जाला कि ई साल के शुरुआत क महीना बा। पुरान फसल के कटाई के थकान आ नया फसल के बोआई के उत्साह से भरल ई महीना के मस्ती के आलम ही कुछ अउरी होला। 
भोजपुरिया समाज भा सभ्यता में चइत महिना के अलगे महातम बा। जहवाँ एक ओरी फसल कटला के बाद के ख़ुशी अउरी नयका फसल के तैयारी के उत्साह के बीच मस्ती अउरी राग के आलम देखत बनेला वइजे मरद लोग के कमाई खातिर परदेश जाये क विछोह क दरद मेहरारू लोग के चेहरा अउरी दिल में साफ लउकेला जेकरा के गीत गवनई में साफ देखल जा सकेला। चइत वइसे त फगुआ बाद आवेला बाकि चइता में फगुआ के मस्ती के झलक भी साफ लउकेला आ पूरा चइत फगुआ, चइती, ठुमरी के राग रंग से सराबोर हो जाला।
जिनगी के ज्यादा हिस्सा बनारस में बीतल बा। बनारस में चइता अउरी फगुआ के जोड़ दिहल जाला आ एकर मस्ती फागुन के रंग एकादशी (शुक्ल पक्ष ) से ही शुरू हो जाला। बनारस से जे परिचित नइखे ऊ शायदे जानत होई कि श्मशान में भी होली खेलल जाला बाकि जे जानत बा ओकरा खातिर मशाने कऽ होरी कऽ अलगे मजा बा। एक कवि लिखत बाड़े 

"मशाने में होली खेले दिगंबर (शिव) खेले मशाने में होली" 

पहिले श्मशान फिर काशी विश्वनाथ मंदिर से होली के मस्ती रंग भरल एकादशी से शुरू होके चइता के असली मस्ती के रंग होली के बाद चइत कृष्ण पक्ष के आखिरी मंगल के बुढ़वा मंगल के नाम से होखे वाला साहित्यकारन आ कवियन के जमघट के परब में बनारस के मस्ती, रईसन क रईसी के साथे पूरा वातावरण फगुआ, चइती, ठुमरी के राग रंग के अलगे नजारा से रूबरू भइल बानी।
इहाँ गिरिजा देवी कऽ ठुमरी गायन "मिर्जापुर कइल गुलज़ार हो कचौरी गली सून कइल बलमू” कऽ सुर भा लोगिन के दिमाग में जवन भी कलाकार, गायक, नृत्यांगना, के नाम घूमत होइ ऊ सभ के सभ बनारस में यह मौसम में आवे खातिर बैचैन मिलिहें। आ “इहाँ न कइल बलमु" सुने के मिलल बा त ओही समय एही कऽ धुन उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के शहनाई में भी सुने के मिलल बा। आ ई सभ के शुरुआत रंग भरी एकादशी से होखे संकट मोचन के संगीत महोत्सव तक चलेला जेकरा में फगुआ आ चइता के मस्ती, ठुमरी के ठुमकी, तबला के थाप, शहनाई के गूंज, बांसुरी के सुर, पंडित रवि शंकर जी के सितार से लेके बनारसी रईसी के शान तक सभ देखे के मिल जाई।
इहाँ विशेष निवेदन ई बा कि बनारसी रईसी क अर्थ पैसा वालन से कतई मत लगाईब जा काहे से कि बनारस के रईसी जेतना फकीरी में नज़र आयी ओतना पैसा वालन के चेहरा पर सपनो में ना नसीब होला। बनारसी रईसी के मतलबे मस्ती आ फकीरी के बादशाहत होला। बुढ़वा मंगल के परंपरा सदियन से चलल आ रहल बा जेवन कि जलियावाला बाग़ कांड के बाद बंद हो गइल आ आज़ादी के बाद काशी नरेश के परियास से फेर शुरू हो भइल।
रउआ लोग ई सोचत बानी कि बात एतना से खतम हो गइल त जरा रुकीं जा काँहे से कि बनारस के साहित्य अउरी संगीत के मस्ती में गंगा महोत्सव अउरी संकट मोचन में होखे वाला सगीत महोत्सव अभी बाकि बा। पंडित जसराज के गायन, हरी प्रसाद चौरसिया के बांसुरी, लच्छू महाराज के तबला, राजन साजन मिश्र, हेमा मालिनी, मिनाक्षी शेषाद्रि आदि सभ प्रसिद्ध नृत्यांगना, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के शहनाई के रंग से सराबोर हो चुकल बा बनारस. साहित्य प्रेमी, लोक संगीत प्रेमी, सांस्कृतिक कार्यक्रम के प्रेमी बानी त फगुआ और चइता में बनारस में डेरा डालीं अउरी जीवन के हर रंग के आनंद लीं। 
चइता के गीतन में काव्य रास के सभ रंगन के झलक मिल जाला जवन कि मन के एक ओरी गुदगुदा देला त दूसरा ओरी आँखि से लोर भी टपका देबेला। ई अवसर पर ईगो गीत के मुखड़ा अबहिन बनल बा जवन कि नीचे दे रहल बानी
‘एही ठइयां नथुनी हेराइल हो रामा कइसे हो सिंगरवा,
घरवा में खोजलिं दुअरवा में खोजलिं 
सैयां जी के आवे क बेरिया हो रामा कैसे हो सिंगरवा॥’
 डॉ अशोक द्विवेदी जी लिखत बा
नी
,
‘मन मधुवाइल, तन अलसाइल
नव सिरजन के, रंग रँगाइल
नीक ना लागे कोठरिया
चइतवा बड़ निक लागे!’
हमार माताजी अउरी हमर लिखल ईगो गीत बा,
‘आयल मधुमास कोयलिया बोले 
लाल लाल सेमरु पलास बन फूले 
सुमनो की क्यारी में भँवरा मन डोले, 
किसलय किशोरी डारन संङ झूले 
महुआ मगन हो गन्ध द्वार खोले. 
आयल मधुमास कोयलिया बोले॥’
साँचे कहाइल बा कि साल के शुरुआत बढ़िया से भइल त सभ बढ़िया ही बीती ई लिहाज़ से भोजपुरिया समाज अउरी सभ्यता में चइता के विशेष स्थान हमेशा बनल रही। बाकी बनारस के सन्दर्भ में त हमेशा फगुआ अउरी चइता बनारस कहल जाई॥
-----------------------------------------------
अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"











अंक - 76 (19 अप्रैल 2016)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

मैना: भोजपुरी साहित्य क उड़ान (Maina Bhojpuri Magazine) Designed by Templateism.com Copyright © 2014

मैना: भोजपुरी लोकसाहित्य Copyright © 2014. Bim के थीम चित्र. Blogger द्वारा संचालित.