संपादकीय

परेम आ विरह के निशानी अउरी नयका साल के आगमन के तयारी ह चइता - जलज कुमार अनुपम

सरसो के फूल पर चढ़ल पियरी, मोजर के बाद फल लगत आम आ लीची, गेहूँ के बाली से लदल खेत आ खलिहान, पसीना के हल्का रंग में एहसास आ नयका साल के तइयारी एहसे नीमन भला कवन मौसम होला, बसंत त उफान पर रहेला आ एही महीना के नाम ह चइत आ एही महीना के स्वागत में होखेला चइता, ढोलक, झाल अउरी हरमुनिया के संगम में जब जनकपुर के पुष्प वाटिका में राम-सीता मिलन, सीता स्वयंवर से लेके राम वनवास अउरी राम द्वारा सीता के निर्वासन तक ले के वर्णन चइता के गीतन के माध्यम से होखेला। बसंत के बारे में बसंत के बारे में डॉ अशोक द्विवेदी कहत बानी :-

‘पहिले मन भींजित /फेरु शरीर
फेर आत्मा ....
परेम के देवता होइते अगर खुश!
अगवानी करीत लोग बसंत के।’
चइता के भोजपुरी में एकरा के घाटो भी कहल जाला बिहार के अन्य भाषा जइसे एकरा के मगही में चइतार अउरी मैथिली में चइतावर कहल जाला. चइता में विरह के गीतन के भी ओतने प्रधानता बा जितना परेम के गीतन के जइसे कि
‘आइल चइत महिनवा हो रामा, पयरी न पेनहब’
के धुन पर रग रग में खुमारी चढ़ेला। चइता के सन्दर्भ में रामायण सिंह जी कहत बानी कि,
“चइता भोजपुरी के कहती मिजाज के धमस होला, 
जवन लय से वातावरण के मादक बनावेला, 
टांसी से दूर-दूर तक आपन औकात से गरदा मचावेला
चइता में छन्द ना लय के कमाल रहेला,
ई पढ़े के ना सुने के चीज ह,
करेजा पहाड़ के अलावे के चीज ह, 
चइता झोरे के चीज ह, झूमे के चीज ह।”
ढोलक के ताल आ झाल के झाझकार पर हुंकार होत रहेला, एह झलकुटन से मन के सभ घुटन निकल जाला।
वइसे चइता के 'दीपचंदी' चाहे 'रागताल' में अक्सर गावल जाला बाकिर कुछ लोग एकरा के 'सितारवानी' चाहे 'जलद त्रिताल' में भी गावेला।
"शिव बाबा गइले उतरी बनिजिआ, लेइ अइले, भंगिया धतुरवा हो रामा" 
काफी मशहूर चइता गीत मानल जाला।
रामनवमी के चौथा दिन यानी चइत शुक्ल पक्ष त्रयोदशी के जैन धरम के प्रवर्तक भगवान महावीर के जनम दिन ह । कई चइता रचयिता लो अपना शब्दन में उनके जनम के भी गवले बाड़ें। "जन्मे त्रिशाला के ललना, कुंडलपुर के भवना, हो चान सुरूजवा उतर आयो हो चइत महिनमां।बसंत ऋतु अपना जवानी पर होला एही कारन से चइत महीना के 'मधुमास' भी कहल जाला ।
एगो तेनी डॉ अशोक द्विवेदी जी के लिखल चइत के सन्दर्भ बा
'मन परे पाछिल बतिया
इ बैरी चइत उसुकावे!
निनिया उडावे अधिरतिया
इ बैरी चइत उसुकावे!
फगुओ गइल दिन कटिया क आइल
जोहते जोहते खरिहनवो लिपाइल
उनका न मिले फुरसतिया
इ बैरी चइत उसुकावे!'
पलायन के दरद अब गाँवन में भी लउकत बा, चइता के गावे वाला मंडली भी अब मुश्किल से भेटत बा जवां की चिंतनीय बा पहिले हर टोला में रहत रहलs। अगर संस्कृति के बचावे के बा त हर आदमी के यह बारे में एह पर सोचे के चाही कहे की ई एगो धरोहर ह जवना के हर पीढ़ी अपना पीढ़ी के सुरक्षित विरासत स्वरूप देवेला।

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लेखक परिचय:-

दिल्ली
ई-मेल:- merichaupal@gmail.com







अंक - 76 (19 अप्रैल 2016)

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