संपादकीय

आइल चइत उतपतिया हो रामा - अभिषेक भोजपुरिया

सगरी बधार पियर लउकत बा, गेहूँ के बाली आपस में ठिठोली करत बा। मसुरी आ खेंसारी झनझना चलल बा। तिसी अपना माथ पर अवकात भर मोटरी उठवले दुर के मोसाफिर अस अपना मंजिल पर पहुँच के तलमला रहल बा। रहर के ढेढ़ी आपस में टकरा रहल बा आ एगो मधुर तान छेरले बा, जवन पछुआ के पीठे-पीठे दूर तलक जा रहल बा। जव भी पियरा चलल बा, जवन आपस में लड़ी के आपन दाना धरती के नेवान करा रहल बा। अपना उपरी छोर से किसान के आँखी के चमक देखी लेलस। देखि लेलस बनिहारन के देह के फूर्ती। एने किसान आ मजदुर अपना अंगुरी पर हंसुआ के दांत पिजावत बाड़ें।
मौसम के मार के त पूछी मत। अगर भोरे-भोरे खेत में जाए के बा त एगो चदर अपना कान्ह पर ले के निकलीं। भोरे के ताकत दुपहरिया के आफत। राती के बिना ओढ़ना के सुत के त देखीं बारह बजे के बाद हाहिला देवे वाला जा। भितरी सुती त मच्छर के चइता सुने के मिलेला। मच्छरदानी के सहारा होला त देहे देही कहाँ। गांवे-गांवे सभ कुछ बदलल जाला। मन मिजाज भी बदल जाला। एह बदलाव के शायदे केहू होई जे ना महसुस करत होई। जीव-जन्तु, किड़ा-मकोड़ा, चिरई-चुरूंग, घास-फूस, पेड़-पौधा सभ। दादी एकरा के चइतार कहेली।
आम आ महुआ के कोंची आपस में मादकता पैदा करेला। माल-जाल गांछ-वृछ सभ आपन रोआं झार देला। ई सभ बदलाव एक दिन में थेड़े होला। ई सभ साल भर के जोगावल थाती ह जवन फगुआ के माथे आइल आ आ के लूटा गइल। पहिले पूस माघ आ फेर फागुन। शीतलहरी के साथे ई का! आलसपन आ गइल! फगुनाहटा हो गइल। दुपहरिया में त निष्चिंत दू मिनट बइठ के त देखीं, आंखी पर निंद के बोझा लदा जाला। अइसे फागुन हिन्दी महिना के अनुसार साल के अन्तिम महिना ह। बाकिर अन्तिम अस लागेला कहाँ। सभका मन में हुलास भर देला। रंग के उमंग सभका तन मन पर चढ़ा देला। साल भर के जोगावल, लुटावत चल जाला आ आगे बढ़ के चइत के स्वागत करेला आ माथ के बोझा चइत के माथ पर चढ़ा देला आ चइत भी फागुन से आपन पीठ थपथपावत ओकर बिदाई करेला।
आही दादा ई का! काल्हू तले फगुआ गवात रहे, अबीर उरत रहे। तले आहो लाला पर ए रामा हो गइल। नया पुरान सरबेर हो गइल। फगुए पर ताल ना टुटल, ढोल झाल के साथे जवन समाज फगुआ गावत रहे उकंठे सुरवा होख ना सहइया ए रामागंवे लागल। गावे वाला के साथे सुने वाला के भी ध्यान बिचलित ना होखे।सदा आनन्द रहे एही द्वारे, मोहन खेले होरी होसे जवन गान बजान के शुरूआत होला उ आधा रात के बाद चइता में बदल जाला आ चइता के शुरूआत हो जाला। चइता दू लाइन से तीन लाइन आ कतना देर तले चलेला। परम्परागत चइता में लमहर दासतान ना चले। चइता साज समाज के साथे तीन बार चढ़ेला आ तीन बार उतरेला आ अन्त में हूंहकार बान्हत शंकर भगवान की जय बोलत समाप्त हो जाला। चइत के धून धरइला के ह खतम ना होखे। गांव-गिरान के रीति-नीति में जरूरत परेला। उ हरदम देवी देवता के गोहरावत रहेला। एही से उ चइता के भी शुरूआत करे से पहिले सुमिरन करेला-
‘‘सुमिरिले ठंईया सुमिरिले माता भूईंया ए रामा,
एही ठंईया होख ना सहईया कि चइता गाएब ए रामा।’’
चइता में परेम आ शृंगार खूब देखे के मिलेला। एह परेम के मर्यादा के साथे भितरो के बात कहा जाला- ‘‘गोर गोर बांह में हरिहर हरहिर चुड़ी आ लिलरा पर के इंगुरी’’ के गीत सगरो गवाला। चइत में जिनगी अपना वेग में रहेला। अपनो मन के बात दोसरा पर फेंक के कहल सुनल जाला। राधा कृष्ण त एगो बहाना होले। उनकर नाम लेके आपन धड़कन गवाला। चइत में मरद मेहरारू अपना राज  के बात कह देले आ ननद भउजाई के भी बात सुने के मिलेला-
‘‘हम तोह से पुछिले ननदी सुलोचनी ए रामा,
तोरा पीठिया ई धुरिया कहाँ से लागल ए रामा।’’
भउजाई के बात के जबाब ननद के मूँह से-
‘‘बाबा दुअरा नाचेला नेटुअवा ए रामा,
भीतिया सटले ई धुरिया पीठिया में लागल ए रामा।’’
चइता में सवालो जबाब चलेला। एक आदमी एक ताल त दोसर आदमी दोसर ताल। मरद मोका पावते मेहरारूओ के गुण गावेला आ गुण गवाई में आरा अलोता के भी बात कह देला। मेहरारू के सुनलो सुनावल काल कर देला। रात खानी के फरमाइस पचल ना आ भरल सभा में आ के कह देले-
‘‘चुनरी लेआद पिया चोलिया सिया द,
आरी आरी गोटवा लगा द हो बलमुआ चइता मासे।’’

एहो रामाचइता मासेएगो अलगे रंग जमावेला। चइता कटनी से शुरू हो के दनदनात दवनी तक चल जाला। चइता सभ संइतेला, जोगावेला आ फागुन ओरावेला। बाकिर चइत अइसे करो त कइसे? ओकरा सामने पुरा साल लउकेला। एह तरे से चइता ताक झांक तोपत उघारत, सहोरत बटोरत सभका से मिल जूल के रहे के सनेस देत चल जाला।
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अभिषेक भोजपुरिया











अंक - 76 (19 अप्रैल 2016)

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