संपादकीय

दू नाव पर पैर रखला पर जिनगी ना चली - अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"

एक व्यक्ति दू नाव पर सवारी, कइसे? समस्या विकट बा आ ओहु से विकट बा ओकर समाधान। सबसे बड़ बात ई कि समाधान के चिंता केहु के नईखे काहे से आज हर केहु जेतना ज्यादा मिल जाये ओतना नाव पर सवारी करे खातिर ना सिर्फ लालाईत बा बल्कि सवारी के मजा लेबे खातिर कवनो हद तक जाये खातिर तैयार बा। ना कोई समझे के तइयार बा आ ना केहु के पास समझावे के शक्ति मौजूद बा, सबसे बड़ समस्या ई कि सामने वाला के त्याग भी करल मुश्किल काहे से अपना के छोड़ल आसान ना होला। चलीं पहिले वस्तु स्तिथि समझावे के कोशिश करत बानी ई उम्मीद में कि शायद केहु हमरा से बेहतर सोच राखत हो।
समाज हो, परिवार हो, नर हो या फिर नारी ओकरा के चलावे खातिर एक नियम बनल बा चाहे बनावल जाला। ई नियम सामाजिक, धार्मिक, देश क कानून क मिलल जुलल रूप होला जवन या त सर्वमान्य होला या फिर बहुमत से बनावल होला आ ई सभकरा पर बराबर रूप से लागू होला। नियम भा परंपरा समय चाहे काल अनुसार बदलत भी जाला बशर्ते सब सहमत हो या फिर बहुमत वर्ग एकरा साथै खाड़ हो। नियम, परंपरा के बदले खातिर समय और काल के अनुसार विरोध भी होत रहेला आ विरोध सफल ना भईला पर समाज अउर परिवार में टूट भी होत जाला। 
एक से सहमत ना भईला पर कुछ लोग अलगा होके दुसरका वर्ग या जमात में शामिल होईल आज आम बात बा शायद एही क परिणाम बा कि आज समाज में अनगिनत विचारधारा, धर्म, जाति, मौजूद बा। एक छोड़ के दूसर के हाथ थामल में कवनो बुराई नईखे बाकि एहु के साथ रहब अउरी ओहु के साथ रहब के ही दू नव के सवारी के संज्ञा दिहल सकल जाला जवन कि उचित नईखे आ झगड़ा झंझंट के जड़ ही कहाई। जदि केहु के कवनो समाज चाहे परिवार के अंग बन के रहेके बा त ओकरा के ओह समाज चाहे परिवार के परम्परा, नियम आ संस्कृति के माने के ही पड़ी। इहाँ ई कहल बेमानी होखी कि हम तोहरा के मानत बानी लेकिन नियम हमार चली।
नियम हो भा परंपरा आ चाहे सामाजिक कानून सब एक दूसरा के पूरक हो सकेला बाकि केहु एक दूसरा के काट ना सकेला।हर केहु के अपना अपना हिसाब से जिए के अधिकार बा आ यही कारन बा कि एक धरम से दू धरम, एक परंपरा से दू परंपरा आ फिर एहु के टुकड़ा होत गईल लेकिन अपना अधिकार के आड़ में अपना साथै दूसरा के जिनगी नरक करे क अधिकार केहु के पास नईखे बात के अउरी खुल के कहे के बात हो त फिलहाल हम शनि शिंगणापुर के घटना के उदाहरण देबे एक परंपरा बरसो से चलल आ रहल बा, जेकरा के नईखे माने के बा ऊ अलगा हो जाओ आ दूसर शनि के मंदिर बना के पूजा शुरू करे, के रोकले बा बाकि जदि ओहि शनि मंदिर के माने के बा त उहाँ के परंपरा के सम्मान पहिले करे के पड़ी ज्यादा सरल भाषा में कहीं त हम ई कहब कि जदि हमरा अपना परिवार के साथै रहे के बा त गलत या सही परिवार के मुखिया के बनावल नियम के पालन करे के ही पड़ी यदि केहु सदस्य के नियम के पालन ना करे के बा त साथै रह के सबकर जिनगी नरक करे के त कवनो औचित्य नईखे 
समझावे खातिर जरूर शनि शिंगणापुर के नाम लिहल बा बाकि ई स्थिति कमोवेश हर विषय आ स्थिति पर लागु होला बाकि व्यवहार के स्तर पर ई हो रहल बा कि ना खेलब ना खेले देब बस खेलवे बिगड़ेब आ एमा आग लगा के तमाशा देखे वाला लोगन के चाँदी हो रहल बा आ शायद फायदा भी हो रहल बा बाकि अइसना लोग के तुलना बन्दर से ज्यादा ना होखी लेकिन जदि अइसन लोग बन्दर बा त बकिया लोग काहे बिल्ली बन के दू बिलाई के लड़ाई में बनरन के फायदा वाला कहावत चरितार्थ कर रहल बा
आग लगाइब खुद भी जरब, 
आज ना सही काल त मरब, 
ना रही जग ना ही तू विष्णु, 
दिल मिलाईब तब ही तरब
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अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"











अंक - 71 (15 मार्च 2016)

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