संपादकीय

भोजपुरी क अमर गीतकार आ देश भक्त महेंदर मिसिर - केशव मोहन पाण्डेय

महेन्दर मिसिर एगो विलक्षण गुनी आ धूनी के नाम ह। उनकर व्यक्तित्व कवनो एगो मोनिया में ना बंद रहे, ऊ त अइसन पारा रहले कि जेके जवने कोर से पकड़ के समेटे के चाहीं, ऊ कवनो दोसरा छोर में विराजमान लगइहें। गतर-गतर खाँटी माटी से सिरजल रहे। पहलवानी के बेरा माटी के रस पोरे-पोर पहुँचल रहे। रूप-रंग से ले के पहिनाव-ओढ़ाव, शौक-शैली से ले के उठल-बइठल, हर रूप में ऊ एगो आकर्षक मानवता के नाम रहले। ओह भाव-भंगिमा पर आ गोर-भभूका रंग पर मुँह में पान के चबाये वाला मिसिर एगो अलगही जीवन जियें। महेंदर मिसिर के काया के सिरजना सुन्नर रहबे कइल, ऊ बड़ा सुरीला गइबो करें। उनका सुभावे में गीत-संगीत के प्रति रसियापन रहे आ ऊ जानकारो रहले। ऊ बड़ा तल्लीनता से गीत लिखबो करें आ गइबो करें। पूरबी गायन के लोक शैली उनका नस-नस में बसल रहे। ऊ अपना रचना-धर्मिता से लोक-संगीत आ लोक-साहित्य के बहुते समृद्ध कइले।

महेंदर मिसिर खातिर लोक के माने लोक-जीवन से जुड़ल साधारण मनई के मन के राग रहे। उनका गीतिओ में उहे मन के राग रहे। मन के रगवे त उनका गीतियन के विशेषता रहे आ ओहि से त आजुओ मिठास जस के तस बनल बा। 
आज महेंदर मिसिर के बारे में ईयाद अइला के कारन ई बा कि आज 16 मार्च ह। जी, छपरा से 12 किलोमीटर दूर काहीं मिश्रवलिया गांव में आजुए के दिने, माने 16 मार्च 1886 के महेन्दर मिसिर एह धरा-धाम पर आइल रहले। वैसे त लइकाई के बिगड़ल मन जल्दी से माने ला ना, महेंदर मिसिर त बिगड़ल मन वाला भले रहले, बाकिर कुछ अद्भुत सुभाव रहे। उनका बारे में त खाँची भर किस्सा-कहानी सुनला लेकिन ओहू में सबसे चर्चित अपना घर में नोट छापनेवाली मशीन राखल ह। आज़ाद सुभाव के मस्त-मौला महेंदर मिसिर मशीन से नोट छाप के आजादी के लड़ाई लड़त वीर-बांकुरन के नोट देस। विश्वास पर घात भइल आ बाद में पकड़ा गइले। देश आज़ाद भइला के पहिलहीं गीत के साथे आज़ादी के दीवाना महेंदर मिसिर 26 अक्टूबर 1946 के एह दुनिया से विदा हो गइले। 
आज भोजपुरी के ओह पुरुखा के जन्मदिन पर उनके जिनगी से सबसे घनिष्ठता से जुड़ल गीत ईयाद आवत बा। श्री आर डी एन श्रीवास्तव जी अपना एगो पोस्ट में महेन्दर मिसिर के 'भोजपुरी के अमर गीतकार व देश भक्त' विशेषण से सजा के एह गीत के बारे में कहले रहनी कि उनकरा प्रति सबसे अधिका समर्पित उनकर सेवक 'मोतीचन्द' वास्तव में एगो 'ब्रिटिश जासूस' रहे। ऊ खूब स्वादिष्ट पान खिआ-खिआ के विश्वास जीत लेहलस। ओही कराने महेन्दर मिसिर के गिरफ्तार करवावे में मोतीचन्द सफल रहले। छपरा कोतवाली में ओहके देख के महेंदर मिसिर पूछले कि 'मोतीचन, तू कइसे?' केहू असलियत बतावल त कहले कि 'हमरा खातिर त तू हमार मोतीचनवे हव।'
विश्वास में घात पर उनकर बोल फूट पड़ल - 
पाकल-पाकल पनवा, खिअवले मोतीचनवा 
पिरितिया लगा के पेठवले जेहलखनवा। 
बाद में ओहि गीत के शब्दन के कुछ बदल के 'बिदेसिया' फिल्म में ई गीत आइल कि -
हँसि हँसि पनवा खियवले बेइमनवा
हँसि हँसि पनवा खियवले बेइमनवा
कि अपना बसे रे परदेस
कोरी रे चुनरिया में दगिया लगाइ गइले
मारी रे करेजवा में तीर। 
आज पूरबी के पुरोधा आ भोजपुरी गीतन के सथवे स्वाधीनता के अमर सिपाही महेंदर मिसिर के व्यक्तित्व आ कृतित्त्व के सादर प्रणाम करत बानी। 
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लेखक परिचय:-

2002 से एगो साहित्यिक संस्था ‘संवाद’ के संचालन।
अनेक पत्र-पत्रिकन में तीन सौ से अधिका लेख
दर्जनो कहानी, आ अनेके कविता प्रकाशित।
नाटक लेखन आ प्रस्तुति।
भोजपुरी कहानी-संग्रह 'कठकरेज' प्रकाशित। 
आकाशवाणी गोरखपुर से कईगो कहानियन के प्रसारण
टेली फिल्म औलाद समेत भोजपुरी फिलिम ‘कब आई डोलिया कहार’ के लेखन 
अनेके अलबमन ला हिंदी, भोजपुरी गीत रचना. 
साल 2002 से दिल्ली में शिक्षण आ स्वतंत्र लेखन.
संपर्क –
पता- तमकुही रोड, सेवरही, कुशीनगर, उ. प्र.
kmpandey76@gmail.com
अंक - 71 (15 मार्च 2016)

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