संपादकीय

अंक - 31 (9 जून 2015)

भोजपुरी एगो भरल-पुरल भाखा हऽ जेवन एक हजार साल अधिका समय से चलत आवत बे। ई आज भारत के कईगो आधुनिक भखन से पुरान बे औरी हिन्दी एगो अईसने आधुनिक भाखा बे जेवना से भोजपुरी जोड़ दिहल जाले। भोजपुरी हिन्दी से बहुत पुरान भाखा बे। लेकिन लिपी एगो भईला औरी एक नियर सबदन के कारन भोजपुरी के हिन्दी के उपभाखा मानल जात रहल बा। 
भोजपुरी एगो बरिआर भाखा रहल बे। जबले कैथी लिपी के परियोग भईल भोजपुरी कऽ बोलबाला सगरी बिहार औरी पूर्वी उत्तर परदेस में रहे लेकिन देवनागरी लिपी के परचार खाती भोजपुरी देवनागरी लिपी अपना लिहलस। भोजपुरिया लोगन ए निरनय भोजपुरी पर बहुत भारी परल। सगरी लिखित भोजपुरी साहित्य जेवन कैथी में लिखल रहल सङही खतम हो गईल। आज हाल ई बा कैथी जाने वाला लोगन के दिया ले के खोजे के परी। 

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सब लोग देहात से जात बाड़े शहर।
हर केहू पकड़ले बाऽ एगही डहर॥

गँउआँ में नाही केहू रहे चाहत
सब केहू बतिया एगही कहत।
एही से गाँवन में भइल बाटे कहर
सब लोग देहात से जात बाड़े शहर॥
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‘भोजपुरी भाषा के प्रमाणिक रूप’, ‘भोजपुरी भाषा के एकरंगी रूप’, भोजपुरी भाषा के मानकीकरण के आवश्यकता’ जइसन विषय पर समय समय पर विद्वावनन के विचार आइल। भोजपुरी के मानक रूप के तैयार करे के प्रयास लगातार चल रहल बा। कहे के ना होई कि भोजपुरी साहित्य के सृजन सिद्व आ नाथ पंथ, कबीर पंथी, भगताही आ सरभंग सम्प्रदाय के संत भक्त कवियन के ‘बानी’ से शुरू भइल। बाकिर साहित्यिक रूप में भोजपुरी भाषा के निर्माण पिछला 100 साल से हो रहल बा। 
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