संपादकीय

संपादकीय: अंक - 28 (22 मई 2015)

मैना के अंक हर मंगर के परकासित होला लेकिन ए बेरी देर हो गईल बा औरी शुक के परकासित होता। ए देरी खाती सभ से पहिले रऊआँ सभ से हाथ जोड़ के छिमा माँगत बानी। साहित्य कऽ काम बड़ा ऊरेब होला औरी एगो पत्रिका कऽ संपादन ओकरो ले बेसी ऊरेब होला। ए पत्रिका के पहिलिका अंक 11 मई 2014 के आ आइल औरी बीतल 11 मई के साल भर हो गईल। साल भर में साठ गो साहित्यकारन के सैकड़न गो साहित्यिक रचना पत्रिका में प्रकासित भईली सऽ जेवना में कबिता, काथा, लेख, नाटक, आलोचना, जीवन चरित, व्यंग्य औरी संस्मरण जईसन विधन में रचना बाड़ी सऽ। एह दौरान बहुत लोगन के साथ मिलल, तऽ बहुत लोग दीसा देबे मे मददगार भईलें जिन हिरदय आभारी बानी। कुछ साहित्यकार लोग आपन किताब भी भेजनी समीक्षा खाती लेकिन एगहू समीक्षा एह साल ना लिखाईल। कोसिस रही कि असो समीक्षा औरी आलोचना पर बिसेस काम होखे।
अंक - 28 (22  मई  2015)
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