संपादकीय

ए पानी - गुलरेज शहजाद

अंजुरी में पानी के धइले
सोचs तानीं
ए पानी!
काहे तोहर नेह के छुवन 
दुःख के दाहड़ खानी मन में 
गोंगियाइल बउराइल जाता 
कतना नीमन याद जुड़ल बा 
तोहरा संगे 
लईकाईं में जवरे-जवरे 
खूबे खेल तमासा कईनीं 
घूँट-घूँट तोहरा के भरनीं 
पियास बुझइनीं 
डुबकी लगइनीं 
पोखर में हम 
उबडुब भइनीं 
नाहर तीरे 
गोड़ लटइले,घंटन 
छपछप-छपछप कइनीं 
आ बरखा में तोहरा संगे 
लपिटइनीं हम 
नचनीं गइनीं 
अब काहे तू मुंह चोरइलs 
धरती के भितरी घुसियइलs 
तोड़लs बरखा से तू नाता 
ई हितई में धोखा भइल 
मननीं कि हम तोहरा संगे 
धोखा कइनीं 
आपन गरज-मतलब खातिर 
बे मतलब के खरच कइनीं 
नद्दी नाला ताल तलैया 
नाहर पोखर 
मतलब कि जे तोहर घर बा 
ओकरा के ना बुझनीं जननीं 
सबके हम परदुसित कइनीं 
साँच बात तs इहे बाटे,कि 
हमनीं के धोखा कइनीं 
तोहरा संगे 
अब हम कतना बात बताईं 
कतना लजाईं 
माफ़ करs अब 
जाए दs तू 
लवटs अब कि 
कतना नवका बालक-बुतरू 
तोहर रास्ता देख रहल बा 
अब ओकनी के राह देखावs 
नाचs गावs खेल खेलावs 
ओकनी के जिनगी समझावs

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