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लोक जीवन आ सामाजिक सरोकार में अमृत घोरत चइता गीत - जनकदेव जनक

चइता के गीतन में लोक चेतना, देवी उपासना आ विरह वेदना के अभिव्यक्ति के पुट जेयादा मिलेला. एह गीतन में समाज में परचलित रीति रेवाजन के गुनगान रहेला. दरअसल चइता गीत लोक जीवन के प्राण ह. जेकरा में लोक उत्सव, बसंत बहार आ वरतमान मानवीय परिदृश्य के सचित्र चितरण मिलेला. लोक साहित्य एक तरह से मनुष्य के जिनगी के सिरमउर ह. लोक कलाकर भा लोक गायक अपना मधुर आवाज में जन मानस आ अपना हिरदय के अनुभूति प्रस्तुत करेला. जेकर प्रभाव सुननिहार आ देखनिहार पर अमिट छाप छोडेला. जब जब ढोल, झाल, मंजीरा, करताल हारमोनियम के आवाज वातावरण में गुंजेला, तब तब अपने आप मानव मन अजब उत्साह से भर उठेला. चइता त बसंत रीतु के सबसे ख्याति प्राप्त चइत राग ह. जवना के लय आ ताल में जन मानस खो जाला. गीत संगीत के फुहार में ओकर दिन भर के हरारत आ मुरझाइल चेहरा एकाएक खिल जाला. गंगा मइया के लहर खानी ऊपर नीचे होत चइता के कोरस धारा जब नि:सबद रात के बहेला त ओकरा प्रवाह में लोक चेतना भी समाहित हो जाला. ओह समय देखनियार के रात के अन्हरिया आ अंजोरिया ना चिन्हाव. फूल के सुगंध लेखा महकत हवा के दिशा में भीड़ भेड़न खानि दउर पड़ेला.
भोजपुरी भासा भासी क्षेत्र में चइता के शुरूआत माई सुरसति, गउरी गणेश के सुमिरन या देवी देवता के पूजन के साथ होखेला. ओकर एगो बानगी देखल जाव,
‘सुरसति मइया हो सुरसति मइया, 
कंठे सुरवा होख ना सवारिया हो रामा...कंठे सुरवा....,
एहिजा के ठईयां सुमिररि मत भुईयां हो रामा, एजी ठईयां....,
आज चइत हम गायब हो रामा, एही ठईयां...’
आपन देश खेती किसानी पर निरभर बा. एह काम से भोजपुरी जनपदो अछुता नइखे. चइत राग में भूमि पूजन के चरचा अभी भइल ह. मंगलाचरन के रूप में जमीन के पूजा जरूरी बा. चइत मास में गेहूं,चना, तिसी, जौ, अरहर,तेलहन आदि के फसल तइयार हो जाला. बसंत रीतु के आगमन के साथे बाग बगीचा नव किसलय से भर उठेला. आम के गाछ में मोजर लग जाला. मोजर में आम के टिकोरा लउके लागेला. एह मन भावन झलक पर भला लोक गायक कइसे चुप रह सकत बा.एकर एगो बानगी देखी, 
‘उतरल फगुनवा चइत चढ़ आइल हो रामा अमवां में...
लउकता टिकोरवा हो रामा अमवा में...’
मरयादा पुरुसोत्तम राम, भगवान कृष्ण के बाल लीला, आदिदेव शिव आ श्रीराम भक्त हनुमान के आस्था लोक जीवन में रचल बसल बा. चइता गीतन में देवी देवता लोग के चरचा ना हो पायी त गीत अधूरा रह जाई, श्री राम जनम पर एगो बानगी 
‘चइत सुकल पछ नवमी के भइल 
राम के जनवां हो रामा, चइत सुकुल पछ..., 
जाहु जाहु उधव बाबा हरि के लावे हो राम, हरि बिना …,
हम कइसे बचब हो रामा हरि के बिना.., 
विनोक्ति अलंकार से भरपूर विनोक्ति चइत राग में कन्हइया प्रेमी गोपी लोग हताश बा, उधव बाबा से श्री कृष्ण के मथुरा से गोकुल बुलावे के गुहार लगावत बा. सब नदियन में गंगा के महातम बड़ा निरमल आ पबितर बा. ई नदि धार्मिक आस्था के आयाम बाड़ी. लोग कहेला कि पापी लोग गंगा नहान करके संसार के पार हो जाला. ओह कोसिस में हर साल कातिक पुरनमासी के गंगा नहान करेला. देखी, एगो गीत में 
‘पार कर हमनी के नइया ए रामा, हे गंगा मइया।'
विछोह के आग में जरत नायिका के मरद परदेस कमाये गइल बा. ऊ घर में अकेला बिया.ओकर देवर भी मथानी में रास अगोड़ता. खिड़की से झरझर हवा आवत बा.पुरबइया के उमसल बेयार तन बदन के लसलसा देले बा. ऐसे में दूर से आवत चइती के बोल,
‘पिया परदेसिया देवर घर नाहीं , 
केकरा से कहीं मन के बतिया हो रामा...,
दिन नाही चैन रात नाही निनिया, 
रही रही जिया डेराला हो रामा...’ 
एह विरह गीत में विरहीन के तन आ मन के दशा चित्रित कइल गइल बा. ओही जा एगो दोसर गीत में नायिका अपना आंगन में सुतल बिया. रात के बड़ा उमस आ गरमी बा. जेकरा से ओकरा नींन नइखे आवत. जब ओकर आंख खुलत बा त नायिका के नजर अपना ओसरा में सुतल देवरा पर जाता, जवना के नजर उनका चोली के फूलगेंद पर ठहरल बा. देवर के ललचाई नजरन पर नायिका का कहत बाड़ी, 
‘पिया परदेसिया सुतली हम अंगनवा हो रामा, देवरा पापी...,
निरखेला बाल जोबनावा हो राम, देवरा पापी....’
निरखना शब्द चइती गीत में प्रवास विप्रलंब श्रृंगार रस के उत्कृष्ट नमूना बा. सब मिला के चइत राग भोजपुरी साहित्य में भरल पड़ल बा. जरूरत बा शोध करके परांपरिक गीतन के संग्रह के. ताकि भोजपुरी साहित्य पढेवाला विद्यार्थियन के सहयोग मिल सको.
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लेखक परिचय:-

पता: सब्जी बगान लिलोरी पथरा झरिया,
पो. झरिया, जिला-धनबाद 
झारखंड (भारत) पिन 828111,
मो. 09431730244

अंक - 76 (19 अप्रैल 2016)

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