संपादकीय

संपादकीय: अंक - 32 (16 जून 2015)

भारत के राजनीति


राजनीति देश औरी समाज खाती बहुत जरूरी बा पर एकरा भईला कऽ फायदा तबे बा जब देश कऽ सामाजिक, शैक्षणिक, औरी आर्थिक विकास होखे। जब कबो ए तीनों के सही ढँग से विकास होला तऽ देश-समाज उन्नति के शिखर पर पहुँचेला लेकिन एकरा खाती राजनैतिक दलन के सहजोग बहुत जरुरी बा। जब राजनैतिक दल आपन-आपन सुवारथ छोड़ि के देश खाती काम करे लगिहें तहिए भारत फेर से सोना के चिड़िया बनि जाई। पर आज के साँच ई बा राजनैतिक दल अपनी राजनीति के जाति, धरम औरी क्षेत्र से जोड़ लेले बाड़े औरी ए तरे जेतना हो सकत बा देश के नोकसान करत बाड़े।
आज देश में 36 गो राज्य बाँड़े सऽ औरी हर राज्य में अलगा-अलगा विचारधारा के दलन के शासन बा औरी हर दल आपन-आपन विचारधारा के लागू करे के कोसिस करत बा। एतने नईखे, आपन-आपन विचारधारा के लागू करे के ई काम हर पाँच साल पर सरकार बदलला से सँगे होखत रहेला। औरी ए तरे जेतना नोकसान हो सकेला राजनैतिक दल कर रहल बाड़ें सऽ। लेकिन अगर ई हो सकित कि सगरी के सगरी दलन के बस एकसुआहे लोगन खाती काम करे लागो तऽ सभ बदल जाई। जरूरी बा कि ए ओर धियान दियाओ।
देखे में आवत बा कि आज के राजनीति धीरे-धीरे गाँव-देहात भूला गईल बे औरी ओकर पूरा कऽ पूरा धियान शहर की ओर घूम गईल बा। पहिले गाँवन के खुशहाल बनावे के सपना देखावल जात रहे तऽ आज गाँवन के शहर बनावे के देखावल जाता। ई काँहा ले ठीक बा? का एसे देस के केवनो भला होखे के बा का? गाँवन के खतम कऽ दिहला के बाद भारत बाँचि जाई का? का जाने काँहे आजादी के समय से ही गाँव के लोगन के छबी कामचोर औरी बेकार के बना दिहल गईल बा औरी ई छबी लोगन में घर कईल जाता। जबकि गाँव कामचोर औरी बेकार लोगन कऽ नाही बाकिर कर्मठ औरी मेहनती लोगन के कारन खड़ा बा। गाँव के भूलववला से ना गाँव के जियवला से ए देस के भला हो सकेला।
अंक - 32 (16 जून 2015)
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