राजा जी - सुरेश कांटक

सुखल जाता धरती के पानी ए राजा जी
क इसे चली आगे जिनगानी ए राजा जी।

घर वा दुआर छोड़ि के जाल परदेसवा
क इसे बाँची टुटही पलानी ए राजा जी।

अन्हिया बहल उड़ियात बा टे गँउवा
जिनगी भ इल कोल्हू घानी ए राजा जी।

केकरा दो घर वा में सोनवा सुखात बा
केहू के कटेला खूबे चानी ए राजा जी।

हवा में बनावेल तू कहँवा क इसन किलावा
चुनरी धूमिल इहँवा धानी ए राजा जी।

लूगावा लटाला हमर रोजे सरेआम हो
कहेल तू नानी के कहानी ए राजा जी।

कांटक एह धरती के बाँची पानी क इसे
रानी मस्तानी मधुरी बानी ए राजा जी।
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लेखक परिचयः-
नाम: सुरेश कांटक
ग्राम-पोस्ट: कांट
भाया: ब्रह्मपुर
जिला: बक्सर
बिहार - ८०२११२

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