का भइल ऐ मन?
ऊढ़ुके तऽ लाग बा!
चलबऽ तो गिरबे करब
गिरब तऽ घाव लगबे करी।
कबो हाथ टूटी
कबो नरहर फूटी
रसता में भीजला पऽ
जर पकड़बे करी।
का भइल ऐ मन?
रसता सोझ होखे भा टेढ़
चले के परी
चलला पऽ लोग मिलबे करी
मिली
तऽ तीत होई, मीठ होई।
जिनगी खटतूरस होले
बाकी नून तऽ परबे करी।
का भइल ऐ मन?
का भइल जे केहू ना मिलल?
केहू मिल के ना मिलेला
केहू बे-मिलल मिल जाला;
ई लेन-देन हऽ
लाभ-हानि होखबे करी
सूरूज सांझ ले चान होखबे करी।
का भइल ऐ मन?
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लेखक परिचय:-
नाम: राजीव उपाध्याय
पता: बाराबाँध, बलिया, उत्तर प्रदेश
लेखन: साहित्य (कविता व कहानी) एवं अर्थशास्त्र
संपर्कसूत्र: rajeevupadhyay@live.in
दूरभाष संख्या: 9650214326
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