चौपाल - विवेक सिंह
चईत के महीना रहे। फेंड़-पौधन में फूल-फर आकार लेवे लागल रहन। खेत से पाकल फसिलन के कटनी का बाद खरिहानी मे टाल लाग गइल रहे। फर से लदरल बाग आ ...
चईत के महीना रहे। फेंड़-पौधन में फूल-फर आकार लेवे लागल रहन। खेत से पाकल फसिलन के कटनी का बाद खरिहानी मे टाल लाग गइल रहे। फर से लदरल बाग आ ...
का जाने आज का सोच के चनरमी आइल, कि काम करे चउका में ना जाके बहरे हमरा लगहीं आके बइठ गइल। अइसन त पहिलहू ऊ करत रहे, बाकी ओह घड़ी जब कि ओके ह...
सुमेरन मुखिया, रोज सबेरे आ सांझी के गाँव के खरिहान में बईठल सोचत रहस कि गाँव के लोग खातिर कवन अईसन काम कईल जाव जवना से गावँ के भलाई होखो। ...
गोड़लागतानी ईया! ए ईया आज हम बड़ा खुश बनी। मने-मने खुशी के लावा फूटता। अब हम जल्दी अपन खुशी तोहरे के बतावल चाहतानी। हम आज टी.वी. देखत रह...
चतुर के तीन गो लइका बाड़सन। बड़का के नाम बुद्धिमान हऽ तऽ छोटका चालाक आ मंझिला के होशियार। बुद्धिमनवा के सादी-बिआह हो गइल बा। तीन गो लइका क...
हम येगो आन्हर मंगन हईं जे आपन पेट जियावे खातीर इलाहाबाद के गलियन और बजारन मे भीख मांग के अपने परिवार के कइसो-कइसो जिआइलां। ई धंधा ठीक ना ह...
एक त गरमी के दिन आ दोसरे में गाड़ी में बड़ा सकसा सकसी रहे। केहू उतरे त केहू के धकिया के चढ़े । आ केहू केहू चढ़बो करे त केहू के बरियारी धकि...
"चाची, जब हम बिस्कुटओ किनऽ के खात रहीं तऽ तूँ छकुनी ले के धा गइलु कि पइसा चोरा के खाता, अब दिसो करे आइल बानी तऽ ऊपर से छकुनी देखावतऽ ...
आंख मुड़ी में धंसल, गाल मूंह में, आ पेट पीठ में समाइल मुनिया के माई ओकरा के कोरा में ले के दू तीन गो अस्पताल छान मरली। बाकिर सगरी जगेह स...
माई आ बाबूजी के लमहर जिनगी के लमहर अनुभूति रहे। अशोक जब घर से नौकरी करे खातिर पहिला दिन चलल रहन त दुनों परानी बहुत समुझवलस कि बबुआ नौकरी म...
बोनस ला होत परदरशन धीरे-धीरे उग्र रूप लेवे लागल। देखते देखते मजदूर संघ का नेता का हाथ से ममिला निकल गइल। चाय बागान के मनेजर का पुलिस बोलाव...
आलोक कबो आपन हाथ पर बन्धल घड़ी में टाइम देखस। त कबो इंटरव्यू ऑफिस के वेटिंग रूम में टाँगल देवालघड़ी पर।उनका आस-पास उनके उमिर के बिसगो लइका ह...
महंथ जेतने सीधवा हवें ओतने ईमानदारो हवें। दगाबाजी से कई कोस दूर रहेलन बाकीर करीको करेजा के लोग से साधुए नीयर बतीआवेलन। ऊ सोचेलन कि सभे अपन...
नेता काका, भले हमरे काका हउअन पर उनकर असली नाव हमरो पता नइखेे। एकर कारन बा की हम जबसे होस संभरले बानी गाँव-जवार, हित-नात सब केहू की मुहें...
ऊँखियाड़ी में से एक बोझा गेड़ ले के लवटल रहनी तवले कहीं से रमेसरी काकी मिल गइली। हमके देखते कहतारी, 'ए बाबू तूँ तऽ फगुआ में कबो घरे न...