आपन सामाज - दिलीप कुमार पाण्डेय
सांचों देखल जाव त् इंसान घात-प्रतिघात ,हिंसा-प्रतिहिंसा आ स्वार्थ का दलदल में एह तरी धंसल जा रहल बा जे गांव-ज्वार का इज्जत भा राष्ट्र का इ...
सांचों देखल जाव त् इंसान घात-प्रतिघात ,हिंसा-प्रतिहिंसा आ स्वार्थ का दलदल में एह तरी धंसल जा रहल बा जे गांव-ज्वार का इज्जत भा राष्ट्र का इ...
हमनी के कश्मीर हऽ, कान खोल के सुन लऽ, ई ब्रह्मा के लकीर हऽ, तहरा बाप के ना, हमनी के कश्मीर हऽ। सैंतालिस के कंराइल, भूला गइलऽ तूं, पैंसठो म...
खर खबरी तऽ खबरे नु लिही लिखी ऊहे जवन लोगवा दिही। गुरूजी के कईसन बाटे हाल फगुआ के अब ठोकाता नु ताल। नईखी ऊहाँ का तऽ चल गईनी कमे उमर म...
लाठी भाला लेके होता खेत के रखवारी चतुर भईसा लुकाईल बा बाँस काआरी। अतने में बैल तुरईला के भईल हाला दउरल लोग बैल धरे फेक के भाला। मौका ...
ए हवा तू देअईतऽ ई संदेश प्रीतम के, भाड़ा तोहरा ना लागे आवे आउर जाए के, उनका से कह देते होली में आवे के। बाट उनकर जोहे नी बिरहा में जर...
दाँत बनवावे भुअर डाॅक्टर लगे गईले एगो दाँत के बनवाई एक हजार फरमईले। बेसी बनवईला पर कुछ छूट हो जाई हऽ आई ओही दाम में चार गो बन जाई। ...
दिल में जमल रहे जवन प्यार के खखोड़ी ओकरा के खखोर दिहलू बनाके सनिमा लंगट उघार आला भोजपुरियन का इज्जत के बखोर दिहलू। अपना संस्कृति के लूट...
हमरा करेज हर कतरा में तू बसेलऽ, फेर काहे तू हमरा के हरमेशा छलेलऽ। पहिनी साड़ी तऽ हम भईनी आनाड़ी, जे झारे जींस उ भईल बाडका खेलाडी। ...
छल कपट कुछ ना जानस एकदमे बारें अनाड़ी, लाखो रोपेया घोंटलो का बाद आज ले बारें भिखारी, रात-दिन ऊ घरे-घरे घूमलें मानी बिनय हमारी, अबकि ...
दिल में मिलन के आस जगा बीच राह केहू छोड़ गइल । एही में चलल पवन पूरवइया जडला में खोर गइल। दोस आपन कहीं ना किसमत के काल्ह ले बोलत रहे...
जनता का हित से जे करे खेलवाड़, ओकर अनुआई बाड़े हाजार। आमानत में जे करे खेयानत, ओकर इज्जत बाटे सलामत। सरकारी धन जे छन में गटके, ओकरा ...
चारो ओर हल्ला बा अश्लीलता के, गवईया पार कईले हद शालीनता के। चिड़ई चुडुङों अब मुदऽता कान, छेड़ऽतारे गवईया लो जब तान। ध्वस्त होखऽता अपन...
भ्रष्टाचारियन के मत खुलो खातवा ए माई भेजीं जेल में ई पिसऽ सऽ जांतवा ए माई भेजीं जेल में ई पिसऽ सऽ जांतवा ए माई----- करेलेंसऽ अतहते एकन...
छोड़ गइल दिल में मिलन के आस जगा बीच राह केहू छोड़ गइल एही में चलल पवन पूरवइया जडला में खोर गइल। दोस आ...
लडिका सेयाने बा संवागो तऽ बडले बारें तब काहे दूगो पईसा ला घरे-घरे छिछियात बारू। बिआहल लडिकन के गुणवा जानत बाटे सगरी दुनिया...
नोचत बकोटत सिहासन तक पहुँची कतनो कहुंचावे केहू तनको जन कहुंची। धर्म आ जात के जपीं खूब माला गरहा में जास बेरादर आ आ...
धउरल खडहुल में अईली माई, चुस चुस पिअ तारे दूध दूनु भाई। शिकारी लोग पसरले चहु ओर, घेर के रखीहे शिकारी पूरूब छोर। ग़म पाई खाडहा ...
लिखे के त सहुरे नइखे का हम लिखीं, जीभ बा काटाईल त नुन कइसे चिखीं। पतई क रंग देख खाद खरी बांटाय, खाली हाथे लौटले घरे मुँह लटकाय। चहके आ...
दिलीप कुमार पाण्डेय जी कऽ तीन गो कबिता 'ई होई कब ले', 'गोहार' औरी 'अनुआई हजार' समाज में जेवन हो रहल बा ओकरा बार...
एक जाना पुरान कागज खोज खोज के परेशान हो गईलन। ना मिलला पर अपना धरमावतार(मेहरारू) से पुछलें, "कवन कागज हो चर चिचिरी पारऽलका?"...