जयशंकर प्रसाद द्विवेदी के सात गो कविता
बुड़बक आ बकलोल बुड़बक आ बकलोल बोलत बिरही बोल बेगइरत बा निपोरत खीसी बुझs बबुआ गदह पचीसी॥ एक के बाबू,एक के माई दूनों बेकल, धाई-धाई दूनों के...
बुड़बक आ बकलोल बुड़बक आ बकलोल बोलत बिरही बोल बेगइरत बा निपोरत खीसी बुझs बबुआ गदह पचीसी॥ एक के बाबू,एक के माई दूनों बेकल, धाई-धाई दूनों के...
मनवा के चैन बिलाइल हो रामा पियवा वियोगे। जब से गइलें पियवा विदेशवा भेजें नाही कवनो सनेसवा अँखिया लोरात झुराइल हो रामा पियवा वियोगे। सास सस...
बुड़बक आ बकलोल बोलत बिरही बोल बेगइरत बा निपोरत खीसी बुझs बबुआ गदह पचीसी॥ एक के बाबू,एक के माई दूनों बेकल, धाई-धाई दूनों के बा डिब्बा गोल क...
रचना: ई भाषा बदे ही तमाशा चलत हौ विधा: भोजपुरी कविता कवि: जयशंकर प्रसाद द्विवेदी स्वर: जयशंकर प्रसाद द्विवेदी
चिता भसम लिए हाथ शिवा नहीं खेल रहे होरी॥ अजुवो हौ प्रेतन को साथ शिवा नहीं खेल रहे होरी॥ सगरों मिलावट नाही भावत खोरिन केहू फाग ना गावत अनही...
कुइयाँ मे भंगिया घोराइल सखि फागुन बाटे अगराइल॥ महुआ प बाटे हो अमवा प बाटे अमवा प बाटे, अमवा प बाटे अरे तुलसी के चउरा रंगाइल सखि फागुन बाटे...
जब अनही सभ सुघ्घर लागे मन महुवाइल सुत्तत जागे मुसुकी के का हाल सुनाई सभही फगुआइल बा॥ चलत बहुरिया पायल बाजे बब्बो के अब मन ना लागे भौजी के...
बियहल तिरिया के मातल नयनवा, पियवा करवलस ना गंवनवा ,फगुनवा में॥ सगली सहेलिया कुल्हि भुलनी नइहरा। हमही बिहउती सम्हारत बानी अँचरा। नीक लागे न...
नेपाल घूम के का अइलन देखs कवि जी इतरा गइलन॥ अब रोज बकैती झारेलन सगरों गियान बघारेलन॥ का एकबचन का बहुबचन सब घोर घार के तारेलन॥ अपने लुगर...
इ भाषा बदे ही तमाशा चलत हौ बिना बात के बेतहासा चलत हौ इहाँ गोलबंदी, उहाँ गोलबंदी बढ़न्ती कहाँ बा, इहाँ बाS मंदी। कटाता चिकोटी सहाता न बतिय...
हिन्दी हिन्दी उहो क़हत हौ हिन्दी गाईं होरी में॥ रटल रटावल घीसल पीटल सभै सुनाई होरी में॥ पढ़ल उरुवा अनपढ़ मंत्री इहो बताईं होरी में॥ लिख लोढ़...
केनिओं थूकब केनियों चाटब चलब कुटनियाँ चाल। हो हमरा बनल रही भौकाल॥ दिन के रात, रात दिन बोलब झूठ के भोरही गठरी खोलब लूटब रहब निहाल। हो हमरा ...
रोज पिंजरा मे दरद सहत टूटल हियरा जोरत ओकरे पीर ढोवत डहकल परान फतिंगा नीयन बुझानी मेहरारू। उ मनई रहे जवन आकास त दिहलस बाकि पतंग के डोर अपनह...
मरिचाई लागेले छुवला पर कबों-कबों बेछुवलो लागि जाले बेछुवल लागल मरिचाई ढेर दिन ले छछराले का जानि काहें ई लगियो जाले कुछ लोगन के। बुझाये ला...
हिन्दी हिन्दी उहो क़हत हौ हिन्दी गाई खोरी में। कबले बनी राष्ट्र के भाषा न कबौं सुनाई खोरी में॥ भाषा विकास के कूल्हि रूपिया भेंट चढ़ाईं खोरी...
रहने सभके माँग उढ़ेरत काम धाम पे पानी फेरत होई ना अभिसार फलाने। रोवें पुक्का फार फलाने॥ पोसलें अब कुछो पोसाता बूढ़वन के सुखले दियाता कहवाँ ब...
सभे बोलत बिरही बचनियाँ हो रामा कवन समरसता॥ देश समाज सभे फुटल अझुराइल घरवों बहरवों से सनेहिया हेराइल बचल नाही नेह के किरनियाँ हो रामा कवन स...
छींटला बिदहला के बादो सलतन्त ना होखे बोवनिहार मेहना आ खीस के निहारल ओकर सुभाव होला तजबीजत रहेला उ बोवनिहार दोसरा के बघार जेवना मे ठकच के ड...
बुढ़ऊ बब्बा के बतियन में अभियो भरल रस बा। गउवाँ अजुओ जस के तस बा। अजुओ आजी कारे बचवा कही के हमें बोलावै हाल-चाल कुल्ही पूछ-पाछ के ख...
अजुवो ले महतारी देखेलिन बिटिया के पीठ खोजेली/ कवनों उबटल गोहिया के चीन्हा झंउसाइल चमड़ी ससुरे से नइहर आइल बिटिया झंखेली माई के एगो अइसन सोच...