संपादकीय

सटत रोज पेवना - जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

पगे पग ठोकर समय के नचवना
कइसन जिनगी सटत रोज पेवना॥

घुमल अस चकरी पलिहर जोताइल
नमियो ना खेते बीया बोआइल
उमेदे से अंखुवा , फोरी न भुंइयाँ
इहे किसानी ,आ ओकर बोलवना॥ कइसन जिनगी......

बहल पछिमहिया बीरवा झुराइल
अब माथे लउर , आउर घहराइल
जरल नाही चूल्हा कई कई बेरा
बबुआ क बतिया कटइला बिछवना॥ कइसन जिनगी......

झै - झै आ कट कट सांझे सबेरे
बिना दिया बाती कुच कुच अन्हेरे
फाटल झुल्ला शरम टुक्का टुक्का
इहे बा मजूरी, टाटी क छवना॥ कइसन जिनगी......

भुंवरी बा बिसुकल बबुनी लोराइल
भइल बन गोइंठा दुअरे पथाइल
कोयर ना भूसा , टटाले भुंवरी
मुवल नेकनीयत बिसरल सपना॥ कइसन जिनगी......
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लेखक परिचय:-

नाम: जयशंकर प्रसाद द्विवेदी
बेवसाय: इंजीनियरिंग स्नातक कम्पुटर व्यापार मे सेवा
संपर्क सूत्र:

सी-39 ,सेक्टर – 3
चिरंजीव विहार, गाजियावाद (उ. प्र.)
फोन : 9999614657
अंक - 114 (10 जनवरी 2017)

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