संपादकीय

रोवाँ झारेला - हरेराम द्विवेदी

रोवाँ झारेला जब जब चुनाव आवैला
तरवा चाटैं धीरे धीरे सुहरावैला
हार जीत से कउनो मतलब नाहीं राखै
जेतना भी लह जाला ठाट से लहावैला

गाँव से सिवाने तक
साव के दुकाने तक
सड़क से शुरू होके
घरे के दलाने तक
चोकरैला घूम-घूम कइके हड़कम्‍म
गजरदम्‍म गजरदम्‍म

इनसे पूछै कब्‍बो उनसे बतियावैला
इनकर उनसे उनकर इनसे बतलावैला
आग लगाके लामे से खाली देखैला
मोका मिलतै ओम्‍में घिउवै ढरकावैला
दादा से पोता तक
पिंजरा के तोता तक
लुत्ती लेसैला ऊ
चिरई के खोता तक
उछरैला कूदैला छम्‍म छमाछम्‍म
गजरदम्‍म गजरदम्‍म

अमन चैन से केहू गाँव में न रह पावै
आपन दुख दरद नाहीं केहू से कह पावै
अइसन माहुर घोरै पता न चलै तनिको
हावा से नद्दी तक चैन से न बह पावै
साँझ से सबेरे तक
घरे के बँड़ेरे तक
अगिलही लगावैला
रइन के बसेरे तक
फरदउरे भी सबके लागै सकदम्‍म
गजरदम्‍म गजरदम्‍म
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लेखक परिचय:-

नाम: हरेराम द्विवेदी
जन्म: 12 मार्च 1936
जन्म स्थान: शेरवा, मिर्जापुर, उत्तरप्रदेश
परमुख रचना: अँगनइया, पातरि पीर, जीवनदायिनी गंगा,
साई भजनावली, पानी कहे कहानी, पहचान, नारी, रमता जोगी,
बैन फकीर, हाशिये का दर्द, नदियो गइल दुबराय
सम्मान: साहित्य अकादेमी भाषा सम्मान,
राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार (उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा),
साहित्य भूषण (उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा),
साहित्य सारस्वत सम्मान (हिंदी साहित्य सम्मलेन, प्रयाग) तथा अन्य

अंक - 114 (10 जनवरी 2017)

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