संपादकीय

मैना - फन्दोत्तीर्णानन्द पुरी

ऊ मैना,
जवन रोज हमरा आँगन में
डुगुरति रहे
पुचकारे वाला का आँगन से
दाना खाके
आ दुतकारे वाला का आँगन से
इँकड़ी के बौछार पा के,
उड़ गइल बिया।

हम आँगन में लागल
कचनार का पेड़ के नीचे बइठ के
आँगन में पड़ल मैना के गोड़ के चिन्हा
देखीला
आ भुलाइल-बिसरल
बतकही के इयाद में डूब के
समूचा दिन
बिता दीहीला। 
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फन्दोत्तीर्णानन्द पुरी


 





अंक - 112 (27 दिसम्बर 2016)

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