विविध

लिखाइ अब - गुरूविन्द्रा सिंह 'गुरू'

लिखल का लिखाइ अब !
लिखले के दुहराइ सब !!

रहल भ्रस्टाचार घोटाला !
कतुना करब कागद काला
तबहुँ समझ ना पाइ सब !
लिखल का लिखाइ अब !!

खुन-खराबा आ गुंडा गरदी
कही खादी आखाकी वरदी
एहि प फिलम बनाइ सब
लिखल का लिखाइ अब !!

काम-वासना के आग जरी !
सच्चा पियार बे-मौत मरी !
प्रेम कहानीका लिखाइ अब
लिखल का लिखाइ अब !!

मेहरी से बा मरदा मजबूर,
तबो मरदे प लागल कसुर !
दहेजवें के दोस लगाइ सब,
लिखल का लिखाइ अब !!

एन जी ओ भी त का करी ,
मुफत के माल जेब भरी !
सुआरथ मे सूर उठाइ सब,
लिखल का लिखाइ अब !!

दोंगी संत सन्यासी कइसन,
दाम-नाम ला भइले अइसन
कइसन ढोंग उ रचाइ कब ,
लिखल का लिखाइ अब !!

देस-धरम, सद-करम गइल,
पइसा ही अब इमान भइल
पइसे के पीछे त धाइ सब ,
लिखल का लिखाइ अब !!

पद-छन्द मात्रा बा गायब ,
तुकबंदी कसबद सजायब
बे-ताल सुर के गाइ सब,
लिखल का लिखाइ अब !
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गुरूविन्द्रा सिंह ''गुरू''

 









अंक - 109 (06 दिसम्बर 2016)

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