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कुक्कुर के कहानी - 4 - धरीक्षण मिश्र

अध्याय - 4

इसवी अनइस सौ बावन में कुक्कुर दल पहरा पर बइठल।
कुकुरन के देखि हुँड़ारन का मन में भारी शंका पइठल॥1॥

हमनी के नीमन तेज कुकुर युग भर तक पहरा कइले सन।
हमनी गरीब का कवरा से लेकिन ना कबें अघइले सन॥2॥

रातो दिन देखले सन हुड़रन के नया नया सावज खाइल।
तब का होखो केतने कुकुरन का मुँह में पानी भरि आइल॥3॥

हुँड़रा कहले सन कुकुरन से जिनगी भर भोंकत रहि जइब।
लेकिन हमनीं का अइसन सुख कहियो सपनों में ना पइब॥4॥

अब से आदत छोड़ पुरान आव हमनीं का साथ रह।
हमने के तरे आजुवे से इच्छा भर खेलत खात रह॥5॥

कुछ कुकुरन का मन में हुँड़रन के बात बड़ा नीमन लागल।
अपना मन में सोचले सन कि अब भागि हमनियों के जागल॥6।।

सुनि के बड़का अचरज होई कुक्कुर हुँड़ार के मेल भइल।
लेकिन कुछ दिन से ई अचरजबा रातोदिन के खेल भइल॥7॥

हमरा बुझात बा लोकतंत्र जे भारत में उतरल बाटे।
ओइमें अइसनका कुकुरन के सोरहो आना सुतरल बाटे॥8॥

कब कवन कुकुर कहवाँ रही एकर ना किछू ठेकाना बा।
मालिक के अब के पूछता सब कुकुरन के मनमाना बा॥9॥

कुकुरन के पेट कट होत गइल आ भागि हमन के फूटि गइल।
सन चौसठ से कुछ कुकुरन के ईमान धरम सब टूटि गइल॥10॥

कुकुरन का और हुँड़ारन का कुछ जन्मजात जे बैर हवे।
आपुस में एक दोसरा से भइला पर भेंट न खैर हवे॥11॥

ऊ बैर पुरनका ना जाने कब कइसे कहवाँ खोइ गइल।
आपुस में दूनूँ मिलि गइले आ सुँघा सुँघौवलि होइ गइल॥12॥

भोंकल कुकुरन के बंद भइल हुँड़रन का दल में गइले सन।
अब आपन पेट भरे खातिर ओकनी के संहति धइले सन॥13॥

अब एह कुकुरन के मन हरदम हुँड़रे का दल में पाटत बा।
हुँड़रन के छोड़ल हाड़ गोड़ एह कुकुरन के दल चाटत बा॥14॥

जवना हुँड़रन के कहलें सन अब तक ले चोर लबार सजी।
ओकनी का साथे चलले सन अब लूटे इहो बहार सजी॥15॥

चौदह छटाक के चाउर बा लोगन के मुश्किल जीयल बा।
लेकिन ई कुक्कुर चुप बाड़े अइसन मुँह धइ के सीयल बा॥16॥

यदि हमनी का माथा पर ना अइसनका चढ़ल अभागि रहित।
तब एह कुकुरन के दल अब तक खिसिया के बोकरत आगि रहित॥17॥

एहि में से केतने कुकरन के ताकत अइसन बेजोड़ रहल।
कि केतने बरियरका हुँड़ार एकनी से लेत न होड़ रहल॥18॥

लेकिन एह बेरी अइसन कुछ कइले सन काम जपाटे के।
कि ई कुक्कुर अब से रहिहें ना घरहीं के ना घाटे के॥19॥

पागल कुकुरन के दाँत कहीं एकनी का देहें लागल बा।
शायद एही से एकनी के मन भइल आजकल पागल बा॥20॥

बारह बरीस कुक्कुर जीए ई बात साँच करि गइले सन।
हम त असमन जानत बानीं कि तेज कुकुर मरि गइले सन॥21॥

अब भेड़ि बकरिया ना बचिहें रोवें किसान एह कारन से।
पहरा पर के कुछ तेज कुकुर मिलि गइले जाइ हुँड़रान से॥22॥

कवनों कुक्कुर हमार होके बोली एकर अब आस न बा।
कवना कुक्कुर के कवरा दीं कवनों पर अब विश्‍वास न बा॥23॥

जसजस बड़का सावज महकल।
तसतस कुकुरन के मन बहकल॥24॥
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 धरीक्षण मिश्र

 









अंक - 105 (08 नवम्बर 2016)

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