संपादकीय

काटऽ चानी - रमाशंकर वर्मा 'मनहर'

भइया जी! अब काटऽ चानी
फिर ना अ इसन राज भेंटाई
बदलऽ जल्द पलानी।
भइया जी! अब काटऽ चानी॥

आइल बा आगे, हथिआवऽ
पीछे वाला भूलऽ।
लागल बा सावन के झूला
झूलि-झूलि के फूलऽ।
सपना के सम्पत्ति हो जाई
जहिया उतरी पानी।
भइया जी! अब काटऽ चानी॥

जे झुलसे उनके झुलसे दऽ
लऽ एयर कण्डीसन।
बहुते धूरि फँकला पर
तोहऊ के मिलल दिन अइसन।
जबले बा अनुकूल हवा
तबले भोगऽ असमानी
भइया जी! अब काटऽ चानी॥

आश्वासन के सेतु बनाके
सबके पार करावऽ।
का लागी, सबके झूठे कऽ
रसगुल्ला से नहवावऽ।
के खा के कही तोहरा के
करेलऽ मनमानी।
भइया जी! अब काटऽ चानी॥

तोहरा पर जे आंखि उठावे
ओकरा के समझा दऽ।
जो ना इनके हड़कइबऽ
एक दिन आई हरानी।
भइया जी! अब काटऽ चानी॥

तूँही बतलावऽ तूँही तऽ
लंठ-आवारा बनलऽ।
बैंक लूटि के, रेल लूटि के
जेल तूँही तऽ छनलऽ।
बिना तियाग कइले केहू के
केहू का पहिचान?
भइया जी अब काटऽ चानी॥
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लेखक परिचय:-

नाम: रमाशंकर वर्मा 'मनहर'
जनम दिन: 31 मई 1952 
पेसा: अध्यापन
ठेकाना: गाँव - खटंगी, डखाना - भरथाँव
तहसील - सिकन्दरपुर,
जिला - बलिया, उप्र

अंक - 105 (08 नवम्बर 2016)

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