संपादकीय

धधाई के - जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

केतना जरत बा
मनही गुरमुसाई के
उहे लगावे आगि बूतलो जराई के॥
नइखे संघतिया कवनों मिलत धधाई के॥

सगरों सबसे लड़नी झगड़नी
सूरत भइल जइसे मरकनी
लागे उनुकर करम कवनों कसाई के॥
नइखे संघतिया कवनों मिलत धधाई के॥

चूल्हा कइनी अलगा
चउक कइनी अलगा
मरद बेल्हमवनी मतिया फिराई के॥
नइखे संघतिया कवनों मिलत धधाई के॥

लइको के कदर ना, मरदो के इजत
सुखो न घर मे, नाही कवनों लजत
अइसन करम गिरल भीत भहराई के॥
नइखे संघतिया कवनों मिलत धधाई के॥

अहम के होला न ठीहा ठेकाना
सभ केहु भइल, काहें बेगाना
सभके डेरववनी खाली लोरिया बहाई के॥
नइखे संघतिया कवनों मिलत धधाई के॥
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लेखक परिचय:-

नाम: जयशंकर प्रसाद द्विवेदी
बेवसाय: इंजीनियरिंग स्नातक कम्पुटर व्यापार मे सेवा
संपर्क सूत्र:
सी-39 ,सेक्टर – 3
चिरंजीव विहार, गाजियावाद (उ. प्र.)
फोन : 9999614657
अंक - 107 (22 नवम्बर 2016)

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