संपादकीय

देखऽ अब का होला ! - चंद्रशेखर मिश्र

देखऽ अब का होला !

जवन कब्‍बो ना करे के
तवनो कइलीं
जहँवा गइले पाप परेला
तहँवो गइलीं
जनलस अरोस-परोस
जानि गयल टोला
देखऽ अब का होला !

कहलीं, त कहलन -
''ई का कइलऽ?
गंगा के घरे जनमलऽ
गड़ही में नहइलऽ? !''
का ऊ ना जनतन जे कमल -
गड़हिए में होला ?
देखऽ अब का होला !

सरग हमैं ना चाहीं
हम त पा गइलीं
केहू जरो
हम त जुड़ा गइलीं
तोहार नाँव लेके
पी गइलीं जहर
रच्‍छा करिहऽ भोला
देखऽ अब का होला !

उँह...!
जवन होए के होई
तवन होई
एह डरन मनई
कब ले रोई।
हमके ?
'हरि प्रेरित लछिमन मन डोला'
देखऽ अब का होला !
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चंद्रशेखर मिश्र

 






अंक - 108 (29 नवम्बर 2016)

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