संपादकीय

बिटिया - रंगनाथ द्विवेदी

ई बिटिया हौ
कहि के
पेटे में ऐकरा के
मार दिहल जाला;
जो पैदो भइल
तऽ बेटवा के आगे
दुत्कार दिहल जाला।

झूठ हौ कहल
कि बिटिया हौ गहना,
जे है सच हौ!
तऽ काँहे के
केहु कऽ बिटिया,
जराय दिहल जाला।
पेट में ऐकराके मार दिहल जाला।

ई दुनिया मरद कऽ,
खुसियो मरद कऽ;
शादी बियाहे कऽ शापित बे बेवा,
कि मरद के सगरी खुशी में,
बोलाई लिहल जाला!

हौ जग कऽ रीति
कि बेवा बिटियवन के खुशीयन क मैना,
बंद पिंजरा में कईके रोआई दिहल जाला।

ई बिटिया हौ
कहि के
पेटे में ऐकरा के
मार दिहल जाला
 
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लेखक परिचय:-

नाम: रंगनाथ द्विवेदी
पेशा: अध्यापन
पता: जज कालोनी, मियाँपुर
जौनपुर, उप्र
मो. न. 7800824758
अंक - 105 (08 नवम्बर 2016)

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