संपादकीय

अब कइसे बबुआ नमाज पढ़े जइहें - जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

अइसन भइल चीर-फार मिटी गइल आर-पार
अब कइसे बबुआ नमाज पढ़े जइहें॥

टभकेले रोज रोज मन के दरदिया
बाबा के नावें से लागेले सरदिया
सपनों में मोदिए के नउवाँ बरइहें।
अब कइसे बबुआ नमाज पढ़े जइहें॥

भइया के जोरे उतान रहन अब ले
बहुते मुफुत के मलाई ऊ चभले
साथी संघतिया नजरिया फेरइहें।
अब कइसे बबुआ नमाज पढ़े जइहें॥

घरवों में दुर – दुर, बहरवों में दुर - दुर
नाचत न मोर अब, माहुर बोलs दादुर
जाने कब राहिल, तखत लेइ जइहें।
अब कइसे बबुआ नमाज पढ़े जइहें॥

हुक्को पर आफति बा,बन होइ पानी
सँभरे बलूचे ना, कश्मीरो मानी?
अब करबs कुछहू, तs भुभुनो उड़इहें।
अब कइसे बबुआ नमाज पढ़े जइहें॥
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लेखक परिचय:-

नाम: जयशंकर प्रसाद द्विवेदी
बेवसाय: इंजीनियरिंग स्नातक कम्पुटर व्यापार मे सेवा
संपर्क सूत्र:
सी-39 ,सेक्टर – 3
चिरंजीव विहार, गाजियावाद (उ. प्र.)
फोन : 9999614657
अंक - 101 (11 अक्तूबर 2016)

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