संपादकीय

कुक्कुर के कहानी - 2 - धरीक्षण मिश्र

अध्याय - 2

जवना कुक्कुर के नाँव अधिक जनता ओह घरी बतावेले।
ओही कुक्कुर का गटई में सींकरि सरकार लगावेले॥1॥

वेतन भत्ता से जकड़ि जकड़ि भेजेले सबके रजधानीं
पाके सगरे सुनहाव इहाँ तब राज करेले मनमानीं॥2॥

ओहि में से एको मूवेला तब और नया बीनल जाला।
कवरा खातिर हमनीं का आगे के थरिया छीनल जाला॥3॥

अइसनका बन्हुवा कुकुरन के संख्या ना उहाँ दु चार हवे।
सगरे भारत मिल के टोटल किछुवे कम चार हजार हवे॥4॥

पहिले जनपद से एक एक अब तहसीले से चार चार।
किछुवे दिन में हर गावें से ले जाए खातिर लगी कार॥5॥

हमरा ना तनिको बा बुझात कवरा एतना कब तक आँटी।
आ सब कुक्कुर काशी जइहें तब के इहवाँ पत्तल चाटी॥6॥

एक मित्र मिटा दिहले शंका जे कुकुरे रोज चरावेले।
कुकुरन के कवरा ना देले कुकुरन से कवरा पावेले॥7॥

कवरा पत्तल किछऊ न मिले ई तब्बो ना अगुताले सन।
एकनीं के अइसन जाति हवे कि सुखलो हा‌ड़ चबाले सन॥8॥

खटमल अइसन कुकरो कुछ दिन तक सूखि पाखि के जियेले।
कहियो न कहियो जब दिन लौटेला तब लोहू पीयेले॥9॥

कुक्कुर सगरे हमरे हउवन धन लागत सजी हमार हवे।
कवरा दे दे फुसिलावे के बीचे मालिक सरकार हवे॥10॥

दुनियाँ के औरी कई देश अब इहे चालि अपनावता।
दुनियाँ भर के सब राजनीति बस एतने में चलि आवता॥11॥

बोलतू कुकुरन के बान्हि-2 कतहीं पर एक जगह कर दीं।
कुरुसी दे दीं लमहर-लमहर कवरा मजगर सयगर दे दीं॥12॥

परजा का केतना सुख दुख बा केहु जोखले बा कि नपले बा।
एकनी के मुँहवा बंद रही त प्रजातंत्र त सफले बा॥13॥

एह युग में राज चलावे के सबसे बढ़ियाँ ई मंत्र हवे।
ईहे नू हवे समाजवाद ईहे नू परजातंत्र हवे॥14॥

सरकारी कवरा जवन कुकुर जवना दिन से ना पावेला।
ओही दिन से ऊ जोरदार जनता में अलख जगावेला॥15॥

एह कुकुरन के इहे कसौटी। गोसयाँ भुइयाँ कुकुर पुजौटी।
समय परी तब पोंछी हिलइहें। काम निकलला पर गुरनइहें॥16॥

मालिक सदा पाछे चलेला ई कुकुर आगे चलें।
मालिक मुवो खइला बिना पर ई सदा सुख से पलें॥17॥

सब घाट के पानी पिये के बानि बहुत पुरान बा।
सबके खिया दीहल हवा इनका बहुत आसान बा॥18॥

काम सबके ना करें पर 'ना' केहू के ना करें।
जवने कहीं इनसे सदा पंद्रह घरी तक हाँ करें॥19॥
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धरीक्षण मिश्र






 



 अंक - 103 (25 अक्तूबर 2016)

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