संपादकीय

खदेरन के पाठशाला (दिवाली) - लव कान्त सिंह

(सभे क्लास में जहां तहां बईठल बा)
खदेरन-जानत बारे ढोंढा भाई...एगो आउर नाया गाना हमार छोटका बाबूजी लिखले ह आ अपना दोस्त से गवईहें..
ढोंढा-सुनाओ मरदे तनी हमनियो के.. एतना त तुही गा लेबे अभी.
लबेदा-रे धरिछ्ना के पोता केंवरिया ओंठगा दे ना त माहटर जी आ जइहें..
(खदेरन अलाप लेके शुरू करत बा,जइसे कौनो बड़का व्यास होखो)
दीयरी लिया दी ना सजन जी दीयरी लिया दी ना,
की आइल-3 दीयरी के तेवहार बलम जी दीयरी लिया० दी ना....

(मास्टर साहेब गेट खोल के प्रवेश)

मास्टर साहेब-रे इ केंवारी लगा के कौन मजमा लगाईले है जी तुम सब भागो अपना अपना बेंच प नहीं त हूंक के जियान क देंगे...ए खदेरन तुम खाड़ा होखो, ढेर ब्यास बनोगे त जानते हो की नहीं हम लगेंगे गवाने त सब सुर बेसुरा कर देंगे..
खदेरन-ऐ मास्सायेब रउरा पाहिले गीतवा के भाव सुनी तब नु..
मास्टर साहेब-हम का सुने...आरे हम त अपना ज़माना के टॉप ब्यास थे, पुछना अपना बाबूजी से..
ढ़ोंढा-ह मासयेब साँचो पहिले गीतवा के भाव जान जाई...भाव ई बा की दियरी से दिवाली मनावे के चाहीं, चाईनीज भुकभुकवा बत्ती से ना...
मास्टर साहेब- ह नू, जतना बन्हिया उ सतरंगिया बत्ती लागता है उ कबो दिया के होगा. कतना बन्हिया खल खल के रौशनी करता है...हम त पढ़े साल भी इहे बत्ती लगाईले थे आ अबकियो चाइनीज बत्ती ही लगायेगे..चारो तरफ घर के लगा दिहिला त नाया कनिया नियर सज जाले हमार घर.
खदेरन-उ त ठीक कहनी मास्सयेब बाकी कबो सोचनी ह की हमनी के संस्कृति दीयरी जरावे के ह आ एकर विज्ञानिक कारण त रउवा विज्ञान में पढ़लही होखेम..
मास्टर साहेब- ना पढले रहती त तोहरा के पढ़ावे कईसे आइति रे चपाट...ढेर होसियार जन बनो खदेरन जी
ढोंढा-मासयेब उ गलत थोड़े कहत बाड़न..
खदेरन-मास्सयेब रउवा से होशियार के होई...बाकी हम त चाहत बानी की हमनी पूरा स्कूल से राय क के रउवा अगुआई में गाँव-शहर घूम घूम के दीयरी इस्तेमाल खातिर अभियान चलावल जाओ...आ कलाटर साहेब के एगो बड़के दिया भेंट क दियाओ...कईसन रही?
मास्टर साहेब-(चिढावत)कईसन रही...आरे बुड़बक शहर में आजकल त आउर काउनो दीया नहीं पूछता है सब....देहाती के देहातिये रह जाओगे, आरे आगे बढ़ो..आगे !
खदेरन- हई देखत बानी मास्सयेब हई धरिछन दा के पोता ह,फाटल जामा पेन्ह के आइल बा पढ़े, जानत बानी काहे...काहे की रउवा नियर बहुत लोग आगे बढ़ गइल आ हेकर दादा आज ले माटी के बर्तन आ दीयरी बनावेलें, बाकी खरीद्निहार नईखे...शादी बियाह में 10 गो हँड़िया, ढकना बेच लेला से का हो जाई, पईसा के कमी से ई फाटल पेन्हले बा। आज पूरा कुम्हारटोली में दुए जाना माटी के काम करेला लो बाकी सब दिल्ली-पंजाब ध लेहल लोग काहे की रउवा नियर लोग आगे बढ़ गइल...एकरा घरे तकारी बनला पनरहियन हो जाला आ परब तीज का होला इ खाली देखले बाड़न स..जब राउर लईका दिवाली में नया कपड़ा पेन्ह के पड़ाका फोरी तब ई खाली देख के खुश होईहें स...एहिसे अगर हमनी माटी के दीयरी आ दोसर सब चीज खरीदेम स तब नु एकरो दिवाली मनी.
मास्टर साहेब-तुम जरुर नेता बनोगे भाषण बन्हिया दे देता है जी
ढ़ोंढा-ए मारसयेब आ भुक्भुक्वा सब चाइना से आवता त बताई की हमनी अपना देश के दुश्मने के नु पईसा देतानी स, ओसे त बहुत बन्हिया बा की कुम्हार लोग के दियाओ आ दीयरी किनावो.
मास्टर साहेब- ढ़ेर पाठ मत पढाओ तुम लोग,अब उ गरीब है आ दोसर काम नहीं करता है त इसमें हम का करेंगे.
खदेरन-ऐ मासस्येब राउर दादा आ बाबु जी सबका घरे पूजा-पाठ कराईले नु आ मान ली की लोग पूजा-पाठ करावल छोड़ देवे चाहे मन्त्र के केसेट बजा के पूजा क लेवे त ओहुलो के दिक्कत आई की ना...आ आज जौना गाछी से आम बेच के लाखो कमाइला ई मुखिया काका के दान कइल ना ह..समाज के एही हिसाब से बानवल बा की सभे एकदुसरा के मदद करत रहो आ जीयत रहो..
मास्टर साहेब- बात त तुम ठीक कह रहा है लेकिन तुम्हारा इतना हिम्मत की हमरा बाप-दादा प चल गया, बईठो जल्दी ना त अभी बहुत खीस में है, सब खीस तुम्ही प उतार देंगे।
---------------------------------------
लव कान्त सिंह








अंक - 100 (04 अक्टूबर 2016) 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

मैना: भोजपुरी साहित्य क उड़ान (Maina Bhojpuri Magazine) Designed by Templateism.com Copyright © 2014

मैना: भोजपुरी लोकसाहित्य Copyright © 2014. Bim के थीम चित्र. Blogger द्वारा संचालित.