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चलत गइनी - राजीव उपाध्याय

रस्ता चले के रहल चलत गइनी
अउरी मिलल जे मिलत गइनी।

हिय मिलल मिलल जियरा कि
जियत गइनी कि मुअत गइनी।

मिलल जे मिलबे कइल कि
साथ सभकर छोडत गइनी।

जे मिली संगे ऊ चलबे करी
सोचि के हम उडत गइनी।

बाकिर काहाँ होला अइसन
कि अइसहीं हम सियत गइनी।

जे साथ बा कबो जइबे करी
इहे जिनगी भर कहत गइनी।

कि साथे काहाँ सभ केहू चले
सोचि हर मोड छोडत गइनी।
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लेखक परिचय:-

नाम: राजीव उपाध्याय
पता: बाराबाँध, बलिया, उत्तर प्रदेश
लेखन: साहित्य (कविता व कहानी) एवं अर्थशास्त्र
संपर्कसूत्र: rajeevupadhyay@live.in
दूरभाष संख्या: 7503628659
ब्लाग: http://www.swayamshunya.in/
फेसबुक: https://www.facebook.com/rajeevpens

अंक - 101 (11 अक्तूबर 2016)

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