संपादकीय

आपन गँउवा – गोबर्धन ‘भोजपुरी’

घन बसवरिया बीया पीपर आ बर बा।
अइह ए जुम्मन चाचा ओइजे हमार घर बा॥

तलवा तलइया के का करी बड़इया।
बहुते नीमन लागे करमी लेड़इया॥
पूछते पुछत चाचा चलि आइब रउरा।
गँउवा के पुरुब बरम जी के चउरा॥
आम अमरूधिया कटहर बड़हर बा।
अइह ए जुम्मन चाचा ओइजे हमार घर बा॥

बीया मसजिदिया शिवाला बाटे भारी।
मौलवी अजान पूजा करेले पुजारी॥
पंडी जी धोबी के चाचा कही बोलावेले।
बाबू साहब सभका से दोस्ती चलावेले॥
लागल खड़ंजा पगडंडी डहर बा।
अइह ए जुम्मन चाचा ओइजे हमार घर बा॥

गँउवे में भूत बाड़े गँउवे में सोखा।
बिगरल बनावेलन सनिचरी के कोखा॥
होखेला झगरवा तऽ पंच फरिआवेले।
धुरी बाबा मन के मइलिया मेटावेले॥
टीबुल सरकारी बाटे अउरी नहर बा।
अइह ए जुम्मन चाचा ओइजे हमार घर बा॥

केहुवे जो मुवेला तऽ छोड़ि हरवाही।
सभ केहु एके साथे जाला परवाही॥
ईदिया का दिने हिन्दू खाले जाके संग में।
फगुवा का दिने मुसलिम रंग जाले रंग में॥
बाड़ा मनसायन लागे कुछु के ना डर बा।
अइह ए जुम्मन चाचा ओइजे हमार घर बा॥

भोरही में निर्गुन गावे शिवजी गोसाई।
चकरी चलावेली कलावती के माई॥
कुछऊ जो घटेला तऽ मिल जाला पइँचा।
अइब तऽ मिलि जाई भाव के गलइचा॥
सतुआ खिआइब तोहके नाही लगहर बा।
अइह ए जुम्मन चाचा ओइजे हमार घर बा॥
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लेखक परिचय:-

नाम: गोबर्धन ‘भोजपुरी’
जनम दिन: 16 अगस्त 1965
गाँव - एकवारी (मठिया), पो-बिसुकिया
जिला-बलिया, उप्र



अंक - 103 (25 अक्तूबर 2016)

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