संपादकीय

कंकाल के रहस्य - 11 - अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"

पाड़ेजी ठलुआ के साथे यस. पी. साहब के सामने बइठल रहले आ अब का कइल जाव पर ही ओह लोगन के बात चीत चलत रहे.

'यस. पी. साहब हमरा के सोहन के मोबाइल काँल के पिछला एक महीना के पूरा डिटल चाहीं खास तौर पर पिछला हफ्ता के.'

'आप कऽ काम हो जाई गमछा महाराज.'

'देखावे खातिर रउआ के ओह दुकान के मालिक के हिरासत में लेबे के पड़ी जेकरा दुकान से ठंडा खरिदल गइल रहे आ ईहे प्रचार करे के होखी कि कवनो दुश्मनी के कारण दुकान वाला ही ठंडा में जहर मिला के देले बा..आ दुकानवाला पहिले से ही सोहन के जानत रहे.'

'ई सब तऽ हो जाई महाराज लेकिन एकर फायदा.?' पाड़ेजी के माँग पर आपन सवाल करत के यस. पी साहब सोच में देखाई पड़त रहुवे.

'हम चाहत बानी कि कतल करे वाला मनही सब तरफ से पूरा निश्चिन्त हो जाये. ओकरा भनक भी ना लागे के चाहीं कि पुलिस केहु भी तरह ओकरा पास तक पहुँच सकेले.'

'ओह.' यस. पी. साहब के चेहरा से लागत रहे कि उनका सब समझ में आ गइल.

'एकरा के भी जरुरी ई बा कि दुकान वाला के कवनो तकलीफ ना हो आ ओकरा परिवार के पूरा प्रोटेक्शन मिले के चाही.'

'ई काम भी हो जाई. लेकिन अईसन कब तक करे के होई.'

'सोहन के मोबाइल के काल डिटेल मिले के दु दिन के भीतर हम आपके संकेत दे देब जेकरा बाद ओह आदमी के जमानत के रास्ता बना दियाई आ ओकरा बाद ओकरा के परिवार साथे कहीं भेज के ई प्रचार कर दियाई कि दुकान वाला अपना परिवार के साथे गायब हो गइल बा जेकर तलाश पुलिस जोर शोर से कर रहल बिया.'

जवाब में यस. पी. साहब खाली पाड़ेजी के देखे लगले..

'का भइल अईसे का देखे लगलीं?'

'सोचत हई कि आप जइसन मनही के पुलिस चाहे सी. आई. डी. विभाग मे होवे के चाही.'

'गाछी पर चढ़ावे के कवनो जरुरत नाहि बा यस. पी. साहब हम जहँवा बानी ठीके बानी बस रउआ सब व्यवस्था करवा दीं भगवान चहिहें तऽ एतकि पारी कवनो गड़बड़ ना होखे देब.'

'आप चिन्ता जिन कइल जाय एह बार हमरो तरफ से कवनो गड़बड़ ना होवे देब.'

'फिर हमरा के इजाजत दिहल जाव.' कहत के पाड़ेजी खड़ा हो गइले साथे साथे ठलुओ खड़ा हो गइल आ अभिवादन के औपचारिकता पूरा कइला के बाद दुनो जाना बहरी चल दिहलस.

अगिला दिना अखबार में सोहन हत्याकाण्ड के धूम मच गइल आ साथे साथे पुलिस द्वारा दावा भी कइल गइल कि पुलिस हत्या के गुत्थी सुलझा लेले बिया आ ह्त्यारा पुलिस के गिरफ्तारी में बा. पाड़ेजी सुबह के अखबार में एह खबर के ठलुआ के साथे मजा लेते रहन कि एगो सिपाही सादे वेश में उनका लागे आइल आ यस. पी. साहब के दिहल लिफाफा देके चल गइल जेकरा पर अति गोपनीय लिखल रहे.

पाड़ेजी लिफाफा खोल के ओकरा भीतर के सूचना में बिजी हो गइले जेकरा में सोहन के काँल डिटेल मौजूद रहे. काल डिटेल के गौर से देखला के बाद पाड़ेजी अपना मोबाइल से लिफाफा के भितरी से निकलल कागज में अलगा तरफ लिखल एगो नम्बर मिलवले आ दुसरा तरफ से फोन उठलवा के बाद कहले.

'हम गमछा पाड़े बोल रहा हूँ.'

'जी सर कहिये मैं आपके लिये क्या कर सकता हूँ?' दुसरा तरफ से आवाज आइल.

'हमको इस मोबाइल नम्बर के मालिक का पूरा ब्योरा चाहिये आ साथे साथे ई नम्बर को मोनिटरिंग पर भी डालना है. आप समझ रहे हैं न कि हम क्या कह रहे हैं?'

'जी सर.यस. पी. साहब का आर्डर है कि आपका आदेश माना जाये.. आप नम्बर बतायें सर.' पाड़ेजी के बात सुनला के बाद दुसरा तरफ से उनका बात के सहमति जतावत के ऊ नम्बर पुछाइल जेकरा बारे में सब जानकारी ईकठ्ठा करे के रहे आ ओकरा के मोनिटरिंग पर डाले के रहे.

'९३३५०२१०८.' पाड़ेजी नम्बर बतवला के बाद फोन राख दिहले आ अपना तरफ गौर से देखत ठलुआ के तनिका देर निहारे के बाद फिर से लिफाफा से निकलल कगजा में बिजी हो गइले.

का पाड़ेजी के पता चल पाइल कि ई मोबाइल नम्बर केकर बा? का ई मोबाइल नम्बर के सहारे पाड़ेजी कातल तक पहुँच पईहें? का मोबाइल वाला ही असली कातिल निकली आकि ईहो सोहना के तरे खाली एगो मोहरा साबित होखी? एह तरह के तमाम सवाल के जवाब खातिर इंतजार करीं अगिला भाग के.

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अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"











अंक - 96 (06 सितम्बर 2016)

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