संपादकीय

छनही तोला, छनही माशा - जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

कइसन कइसन चलल तमाशा
छनही तोला, छनही माशा॥

अगराइल लीहले उ तिरंगा
दिल करिया बारे मन न चंगा
बेटी के इज्जत का होला
बहिन भईल भाषा से नंगा।

अकुताइल सभ, बोली-भाषा
छनही तोला, छनही माशा॥

फूटल खपरा, चूवत मचान
थथमल बाटे गँवई किसान
कबों बाढ़ इहाँ कबहुं सूखा
सटल पेट बा, जुटल ईमान।

फाटल धोती, सियल न आशा
छनही तोला, छनही माशा॥

कबों जुड़ाइल कबों अघाइल
छोड़ल कबहुं कबों बन्हाइल
किसिम किसिम के चूंटा चूंटी
रेघरी पारत बा थउसाइल।

जात-धरम के फेंकत पासा
छनही तोला, छनही माशा॥

बुताइल मन, केकरा तारी
जिनगी अस जस झूर कियारी
झिहिर झिहिर कब बूंदा -बाँदी
तरसत तन, सकुताइल प्यारी।

बीतल जिनगी झेलत झांसा
छनही तोला, छनही माशा॥
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लेखक परिचय:-

नाम: जयशंकर प्रसाद द्विवेदी
बेवसाय: इंजीनियरिंग स्नातक कम्पुटर व्यापार मे सेवा
संपर्क सूत्र:
सी-39 ,सेक्टर – 3
चिरंजीव विहार, गाजियावाद (उ. प्र.)
फोन : 9999614657 
अंक - 96 (06 सितम्बर 2016)

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