संपादकीय

अइले बसन्त - ठाकुर बिसराम सिंह

अइले बसन्त महँकी फइललि बाय दिगन्त,
भइया धीरे-धीरे बहेली बयारि।

फुलैले गुलाब, फुलै उजरी बेइलिया,
अमवाँ के डरियन पर बोलैली कोइलिया।
बोलैले पपीहा मदमस्त आपन बोलिया,
महँकि लुटावैं आप ले बउरे के झोलिया।

उड़ि-उड़ि भवँरवा कलियन पै मंडरालै,
हउवा के संग मिलि कैपात लहरालै।
बढ़ि के लतवा पेड़वन से लपटाली,
उड़ि-उड़ि के खंजन अपना देसवा के जाली।

कहैं ‘बिसराम’ कुदरति भइली सोभाधाम,
चिरई गावत बाटी नदिया क तीर।
चलि-चलि बतास उनके यदिया जगावै,
मोरे मनवाँ में उठति बाटी पीर।
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ठाकुर बिसराम सिंह
अंक - 99 (27 सितम्बर 2016)

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