विविध

सुराज (दू) - जगदीश ओझा ‘सुन्दर’

जनमे के सूतल, जिनिगिया से रूठल
टूटलि ना निनिया तोहार
बतावऽ भइया, जगब ऽ त कहिया ले जगबऽ?

खेतवा जगावे, खेतनिया जगावे
अमवा-महुइया बगनिया जगावे
फटही लुगरिया में धनिया जगावे
सुसुकेले अँचरा पसार,
बतावऽ भइया, जगब ऽ त कहिया ले जगबऽ?

काया डहाइल, महँगिया क मारल
साहस ओराइल बिपतिया से हारल
टूटलि कमरिया हो फाटल करेजवा-
जरि गइले घरवा-दुआर,
बतावऽ भइया, जगब ऽ त कहिया ले जगबऽ ?

दस गो रूपइया क सुदिया सैकड़ा
कबहूँ बेयजवा के छूटल न झगरा
रोजे तगादा में आवे पियादा-
गरिया सुनावे हजार,
बतावऽ भइया, जगब ऽ त कहिया ले जगबऽ?

भइया, बिलइलऽ तूँ अपने करनवा
तहरे मे देसवा के बाटे परनवा
तहरे से जगमग बा कोठवा-अटरिया
काहे मड़इया अन्हार?
बतावऽ भइया, जगब ऽ त कहिया ले जगबऽ?

सूतल गँवावे, जे जागे, से पावे
मंजिल प पहुँचे, जे दउरे आ धावे
मँगला से देला ना भिखियो जमाना
मारेला ठोकर हजार,
बतावऽ भइया, जगब ऽ त कहिया ले जगबऽ?
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जगदीश ओझा ‘सुन्दर’
अंक - 95 (30 अगस्त 2016)

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