संपादकीय

रछाबंधन - पं. प्रभाकर पांडेय ‘गोपालपुरिया’

भारत! बिबिधता से भरल एगो देस पर विविधता में एकता एकर पहिचान। ई बिबिधता ए के विसिस्टता से अबिभूत करेला, एकरी पारंपरिकता के दरसावेला, ए के महान बनावेला। भारत की अगर सांस्क्रितिक बिबिधता के बात होखे, पारंपरिक बिबिधता के बात होखे त इहां की तीज-तिउहारन के कइसे दरकिनार कइल जा सकेला? भारतीय तीज-तिउहार त भारत के सांस्क्रितिक भारत बनवले में, सांस्क्रितिक रूप से भारत के संसारभर के सिरमउर बनवले में सबसे अहम भूमिका निभावत आ रहल बा। ए भारतीय तिज-तिउहारन में जिनगी के सार छुपल बा, जीवन जीएले के गहिराह सूत्र बा ए तिउहारन में। इ तीज-तिउहार भारतीयन के विरासत बा, अमूल संपदा बा एकर परंपरा। जीवन का ह? ए के कवनेगाँ जीए के जाहीं? जीवन में नैतिकता के, धारमिकता के का महत बा? ए सब के जबाब भारतीय परंपरावन में, तिज-तिउहारन में छिपल बा। जब हमनी के पुरखा-पुरनिया अपनी समाज में, देस में ए बिबिधताभरल सामाजिक, धारमिक परब-तिउहार के चलावे के सोंचले होई त जरूर ओ लोगन के ए में जीवन के सही मतलब, मानव अउर समाज कल्यान की साथे-साथे एकता-अखंडता, जीव-परेम आदि के दरसन भइल होई।
भारत में हर महीना में कवनो-ना-कवनो तीज-तिउहार, परब-संस्कार जरूर मनावल जाला, हँ हो सकेला की इ सामाजिक न हो के धार्मिक ही होखो पर कवनो महीना बांव ना जाई। वइसे भी हम भारतीयन के हर दिन धारमिक बा, हर दिन कवनो-ना-कवनो देबी-देवता के समरपित बा त समझि लीं हर दिन तिउहारे बा। पर ए तिउहारन की बीच भी कुछ तिउहारन के अति महत्ता बा। कुछ तिउहारन के आपन एइसन पहिचान बनि गइल बा की इ तिउहार आपन एगो अलगे छाप छोड़त नजर आवेला अउर साथे-साथे परेम-भाइचारा की साथे मानवता के पाठ पढ़ावत नजर आवेला। ए तिउराहन के हम भारतीयन के बेसबरी से इंतजार रहेला अउर ए तिउहारन के अति उत्साह की साथे, पूरा पारंपरिकता की साथे मनावल जाला। इ ही पारंपरिक, सामाजिक, धारमिक, ऐतिहासिक तिउहारन में से एगो तिउहार ह रछाबंधन। आईं सभे ए तिउहार की सामाजिक, धारमिक अउर ऐतिहासिक महत्ता, सरोकार, पहिचान के जानि लेहल जाव।
रछाबंधन, रछा के तिउहार। परेम के तिउहार, भाईचारा के तिउहार। भाई-बहिनी की अखंड परेम के सूत्र में पिरोवत, भाई-बहिनी के अकूट, निच्छल परेम, सनेह, सनमान के दरसावत एगो एइसन संबंध के गाथा लिखेला जवन अपनत्व पर कवनो परिस्थिति के हाबी ना होखे देला। इ तिउहार भगवान सिव के मास सावन में मनावल जाला। सावन के पवित्र महीना, एगो धारमिक महीना, एगो सांस्क्रितिक महीना, संतन के महीना की साथे-साथे किसानन के महीना ह। अपरंपार बा ए महीना के महत्ता। पारंपरिक रूप से, धारमिक रूप से इ महीना एगो एइसन सतरंगी छटा बिखेरेला जवने से सब केहू परभावित हो जाला। रछाबंधन के राखी भी कहल जाला। इहां राखी एगो विसेस अरथ में समाहित बा, जबकी रछाबंधन तनि विस्तारित अरथ में बा पर भाई-बहिनी की ए ही तिउहार के समाहित कइले बा। कथो-ओथा में भी, कवनो धारमिक अनुस्टान आदी में भी रछा बंधवावल जाला पर राखी ना, राखी त सावन मास में पूरनिमा के ही बँधवावल जाला अउर उ हो बिसेस रूप से बहिन अपनी भाई के बाँधे ले। ए राखी में समाइल सनेह, अपनत्व के मिठास एतना गहिराह होला की केतने जबाना गुजर गइले की बाद भी एकरी पारसंगिकता में कवनो कमी नइखे आइल अउर इ अबहिन भी सामाजिकता, धारमिकता, ऐतिहासिकता के समेटले अपनत्व के, पेयार-सनेह के कहानी लिखत आगे बढ़ रहल बिया। इ भारत के परंपरा रहल बा की इहां हर रिस्ता के, संबंध के कवनो-ना-कवनो तिज-तिउहार से बल मिलेगा, कवनो-ना-कवनो तिज-तिउहार संबंधन के महत्ता प्रतिपादित करत नजर आवेला, अउर ए ही स्रिंखला में भाई-बहिन के असीम पेयार, अपनत्व के राखी दरसावेला। राखी के, रछाबंधन के भारत की कुछ छेत्रन में सावनी भा सलूनो भी कहल जाला, एकरी पीछे कारन इ हे बा की इ सावन मास में परेला, सावन में मनावल जाला। भाई-बहिन की पवितर रिस्ता के गाथा लिखेवाला इ तिउहार अपनी आप में बेजोड़ बा, निराला बा। रछाबंधन के महत्ता पुरानन में भी खूब मिलेला। वइसे भी अनुस्ठान आदि में रछा बाँधत पंडीजी लोग हइहे स्लोक उच्चरित करेला-
'येन बद्धो बलि: राजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वाम प्रतिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल
'
यानी कहले के मतलब इ बा की ए ही रछा की डोर से बलिराजा के भी बाँधल गइल रहे अउर ओ ही से हम तोहके भी बाँध रहल बानी। इ रछा तोहार हरदम रछा करी।
श्रीमद्भागवत में मिलेला की जब राजा बलि अपनी पूजा-पाठ से बिसनु भगवान के परसन्न क लेहने अउर भगवान से सदा अपनी साथे रहे के बरदान माँगि लेहने त भगवान राजा बलि की साथे रहे लगने। अब एन्ने भगवान जब कई दिन ले घरे ना अइने त लछमी माई बहुत परेसान भइली। फेर उ भगवान के खोजत, नारद बाबा की बतवले पर राजा बलि की इहां पहुँचलि अउर नारद बाबा की सलाह से ही राजा बलि के रछा बाँधि के अपनी पती यानी की भगवान के मुक्त करवली। ए तरह से भगवान फेन से लछमी जी की साथे निवास करे लगने अउर ओ ही दिन भी सावन के पूरनिमा ही रहे। श्लोक में कहल बा-
'रक्षिष्ये सर्वतोहं त्वां सानुगं सपरिच्छिदम्।
सदा सन्निहितं वीरं तत्र मां दृक्ष्यते भवान्॥'
एगो अउर पुरानिक कथा की अनुसार जब सुर अउर असुर की जुध में सुर यानी की देवता लोग पराजित होखे लागल त भगवान इंद्र गुरु ब्रिहस्पति से सुर लोगन की रछा के उपाय पूछने। ब्रिहस्पति देव इंद्रानी के सावन की पूरनिमा के कुछ विधिवत रछा अनुस्ठान करे के बतवने अउर साथे-साथे मंत्रन से अभिमंत्रित धागा के देवराज की कलाई पर बाँधे के कहने। जब इंद्रानी बिधि-बिधान से पूजा पाठ क के इंद्र भगवान की हाथ पर उ दागा बँधली त ओकरी बाद सुर लोगन के असुरन पर बिजय प्राप्त भइल। ए तरे रछाबंधन के सुरुआत भइल।
एगो अउर कथा की अनुसार जब राजा दसरथ की बान से सरवनकुमार के मृत्तु हो गइल त राजा दसरथ सरवनकुमार की माता-पिता के बहुते ढांढस बंधवने अउर कहने की सावन की पूरनिमा के सरवनकुमार के पूजा-पाठ होई और ओकरी बाद सरवनकुमार के पूजा भी ए ही सावन की पूरनिमा के सुरु भइल अउर रछा की रूप में पहिला धागा पुजा करेवाला लोग सरवनकुमार के अर्पित कइल। 
इतिहास के बात कइल जाव त मेवाड़ के महारानी कर्मवती हुमायूं के राखी भेजले रहली। राखी के कदर करत हुमायूं बहादुरसाह से मेवाड़ के रछा कइले रहे। 
त रछा की ए धागा के बहुते महत्ता बा। बहिन रछा बाँधि के आपन सनेह-कल्यान के भावना दरसावेले अउर भाई भी बहिन के सनमान के रछा में आपन कल्यान समझेला। 
रछाबंधन में एगो बात के विसेस धेयान राखे के चाहीं की अगर सावन की पूरनिमा के भदरा बा त ओई दिन रछा ना बाँधे के चाहीं- 
'भद्रायां द्वे न कर्तव्ये श्रावणी फाल्गुनी तथा। 
श्रावणी नृपतिं हन्ति ग्रामं दहति फाल्गुनी
कहले के मतलब इ बा की भदरा में सावनी अउर फागुनी दुनु करम के मनहाई बा। 
आज की समय में हर तिउहार खाली दिखावा मात्र बनि के रहि गइल बा। हमनी जान के ए तिउहारन के महत्ता समझत ए के पारंपरिक रूप से मनावे के चाहीं। ए के कदर करे के चाहीं ताकी जीवन के असली सच्चाई से हमनी जान परिचित रही जां अउर मानवता के सही अरथ के पुजारी बनल रहींजाँ। ए तिउहार की दिन हमनी जान के परन करे के चाहीं की सनेह, अपनत्व अउर रछा की इ तिउहार के असलियत बनवे राखल जाई अउर समाज में सुख-सांति बनवले में सहायक बनल जाई। अपनन की दुख-सुख में सहभागिता की साथे परेम-भाईचारा के एगो नया मिसाल कायम कइल जाई। बहिन, असहाय की साथे-साथे देस, समाज रछा के महत्ता समझल जाई अउर एगो आदर्श नागरिक बनल जाई, एगो आदर्श भाई-बहिन बनल जाई। जय-जय।
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लेखक परिचय:-

नाम: पं. प्रभाकर पांडेय ‘गोपालपुरिया’ 
कार्यकारी संपादक, भोजपुरी पंचायत 
पुणे, महाराष्ट्र





अंक - 93 (16 अगस्त 2016)

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