संपादकीय

ना जाने जे अँखिया में केतना ले लोर बा - जगदीश ओझा ‘सुन्दर’

ना जाने जे अँखिया में केतना ले लोर बा

प्यारी-प्यादी अँखिया में कारी-कारी पुतरी
पलक का खोंता जइसे झाँकेली कबूतरी
जेतने छलके भरि-भरि आव ओतने
ना जाने नयनवाँ में केतना हिलोर बा

नन्हीं मुटी जियरा के केतना अहेरिया
करेले अहेरि भैया दिन-दुपहरिया
सहत-सहत वार थाकली जिनिगिया
ना जानि करेजवा में केतना मरोर बा

जोहत-जोहत बटिया दिनवाँ सिरइले
पिअत-पिअत रस मन ना अघइले
ना जाने मिलनवाँ के राति बाड़ी केतना
ना जाने बिरहवा के केतना ले भोर बा

चनवाँ-सुरुज कवनो काम नाहीं अइहें
जहिया ए जियरा के दियरा बुतइहें
जब ले परनवाँ बा, तबे ले बटोर बा
जबले सनेहिया बा, तबे ले अँजोर बा
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जगदीश ओझा ‘सुन्दर’
अंक - 93 (16 अगस्त 2016)

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