संपादकीय

अइली भदउवा के राति - दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह 'नाथ'

अइली भदउवा के राति, सघन घन घेरि रहे।
बाबू चढ़लीं रैनि अधिराति, फिरंगी दल काँपि रहे॥
नभवा से गिरे झरि-झरि धार, तुपक रन गोली झरे।
बाबू के घोड़ा करे कटि, कटक गोरा काटि रहे॥

टपाटप बाजे ओके टाप, छपाछप मूड़ी गिरे।
तब घेरले फिरंगिया एकाह, अजब बाबू जुद्ध करे॥
दँतवा से धइले चट लगाम, दुनो हाथे वार करे।
पयँतरा पै दउड़े लागे घोड़, झनाझन खडग चले॥

बीबीगंज भइले घमसान, धमाधम तोप चले।
होखली संगीनवा के मारि, दुनो दलवा जूमि लरे॥
गिरले आयर अरराय, छाती मूका मारि कहे।
‘बाबू गजब फेंके तरुआरि, बाघे अस टूटि परे॥

धन ऊ मतरिया जे लाल, सिलौधा जनु जनम दई।
अब जइहे फिरंगिया के राज, बचवलो से नाहिं बचे'॥
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लेखक परिचय:-

नाम: दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह 'नाथ'
जनम: 1896
निधन: जुलाई 1970
जनम थान: शाहाबाद, उत्तरप्रदेश
परमुख रचना: भोजपुरी लोकगीतों में करुण रस
साहित्य रामायण, गुनावन, कुंवर सिंह आदि
अंक - 94 (23 अगस्त 2016)

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