संपादकीय

रामदेव द्विवेदी ‘अलमस्त’ जी के दू गो कबिता

बगुला भगत

चलले बकुलत सिकार खेले भारी 
‘अब त मछरियो ना भाखन कहनी हमारी’। 
ऊँचे तखत पर आसन जमवले 
पाँख लागल मात करे चमकत कटारी॥ 
चलले बकुलत सिकार खेले भारी॥ 

‘जय हो मछरियन के, सबकर उदय हो, 
तनकी ले अउरी घुसुक आईं आरी। 
पूर्बिज का पापे हम हईं बरहमाचारी 
चलले बकुलत सिकार खेले भारी॥ 

भगत का भेख पर मछरी मोहइली 
जेकरा पर छोह करे जनता वो नारी। 
भगत जी अपना हवाई जहाज पर 
ले गइलन बहुतन के सरगे दुआरी॥ 

चलले बकुलत सिकार खेले भारी॥ 
हाल सदाबरत के केंकड़ा बहादुर 
समुझि पिजा लिहले सिउँठा दुधारी। 
‘हमरा से मामा नाराज काहे भइनी 
रउरे चरन लागल नेहिया हमारी। 
चलले बकुलत सिकार खेले भारी॥ 

मामा दुलार से कान्हें चढ़वले 
भगिना परेम से चला दिहलें आरी। 
चलले बकुलउ सिकार खेले भारी 
चलले बकुलत सिकार खेले भारी॥ 
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बिलाई भगतिन

बिलाई भइली भगतिन आसन जमा के॥ 
उज्जर चदरिया के ओढ़ि रामनामी 
माथा पर मछरी के भसम रमा के॥ 
घोंघन के चुनि-चुनि माला बनवली 
गवें-गवें फेर लगली दुम सुटुका के॥ 
बिलाई भइली भगतिन आसन जमा के॥ 

एक दिन मूसन के मीटिंग बोलवली 
गाँव का बगइचा में मंडप रचा के॥ 
एने-ओने ताकि-तुकि आँख मटकवली 
भाखन के तोब दिहली छोड़ सरिया के॥ 
बिलाई भइली भगतिन आसन जमा के 

‘हम हईं रे बबुअन ! तोहनी के नानी 
न भावे बात पूछ पुरखन से जाके॥ 
तेहन कारन हम भइनी जोगिनिया 
रोज फरहार करीं गंगा नहा के॥ 
बिलाई भइली भगतिन आसन जमा के॥ 

तबहूँ ना बात मान तोहन ए मुअनूँ 
हमरे के वोट दे द एक-एक गिना के॥ 
चूहन का वोट से बिलाई भइली रानी 
लगली सिकार खेले घर में समा के॥ 
बिलाई भइली भगतिन आसन जमा के॥ 

गवें-गवें चूहन के चट करे लगली 
लिहली फुलाए पेट सय चूहा खा के॥ 
आखिर में एक दिन फूटल भंडा 
बँड़वा नचोर लिहलसि मुँह खिसिया के॥ 
बिलाई भइली भगतिन आसन जमा के॥ 

केहू धइलसि अहुँचा, केहू धइलसि पहुँचा 
होखे लागल भगतिन के सेवा बना के॥ 
जनता ना मानेला कहला से भइया 
आखिर में दम लेला सरगे ठेक के॥ 
बिलाई भइली भगतिन आसन जमा के॥
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लेखक परिचय:-


नाम: रामदेव द्विवेदी ‘अलमस्त’
जनम: 9 अगस्त 1919
जनम थान: मधुबनी दुबे टोला, चम्पारन, बिहार 
रचना: उदयन

अंक - 95 (30 अगस्त 2016)

1 टिप्पणी:

  1. बेज्जोड़ .. भोजपुरी भासा के रौनक बतावत आ सान प चढ़ल अद्भुत बिम्बात्मक गीत के साझा करे खातिर मैना के टीम के दिल से धन्नबाद

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