संपादकीय

कंकाल के रहस्य - 7 - अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"

नाश्ता चाय कइला के बाद दरोगा यादव पाड़ेजी के लेके बैरक में बन्द बनारसी के पास पहुँच गइल अउरी पाड़ेजी के इशारा समझ के पाड़ेजी के बनारसी के पास अकेला छोड़ दिहले. पाड़ेजी तनिका देर त सवाल पूछत बनारसी के आँखी में कुछ पढ़े के कोशिश कइले, फिर बनारसी के कुछ पुछला के पहिले खुद बोल पड़ले....
'हम गमछा पाड़े, हमरा के केहु कवनो सम्बोधन से बोलावे हमरा के ओकरा आगे गमछा लगावल नीक लागेला. काम पुलिस वाला ही करी ले पर पुलिस वाला नइखीं.' एतना कहला के बाद पाड़ेजी बनारसी के तरफ एह नजर से देखले मानो ओकरा के अब सवाल करे कऽ छूट दे रहल बाड़े.
'हमरे पास कवने काम से आवल गयल हव गमछा महाराज?' पाड़ेजी क बात खतम भइला पर बनारसी आपन सवाल कइलस.
'आजकाल हम एगो कंकाल के पहिचान करे के केस पर काम कर रहल बानी. जेकर सम्बन्ध तोहरा से होइयो सकेला आ नाहियो. जदि ओह कंकाल के सम्बन्ध तोहरा से ना होखी त तोहरा बारे में शायद हम कुछ ना कर पाईं.' पाड़ेजी बनारसी के सवाल क जवाब दे के तनिका खामोश भइले त बनारसी तनिका देर उनका आँखि में देखलस आ फिर से आपन सवाल दाग दिहलस.
'अउर यदि ओ कंकाल से हमार सम्बन्ध हो तब का होई?'
'तब शायद तोहरा जेल से निकले के रास्ता खुल जाई. शर्त इहे होखे क चाहीं कि तोहरा कतल से कवनो सम्बन्ध ना होखो.'
'अउर यदि हम आपके कउनो सवाल क जवाब ना देबे चाहीं तब?'
'हमरा के जवन खोजे के बा खोजिये लेब. बस तोहार काम तनिका मुश्किल हो जाई.' पाड़ेजी आपन बात कह के बनारसी के देखे लगले. बनारसीओ पाड़ेजी के देखत रहे अउर कुछ सोचत रहे. मानो अंदाजा लगा रहल हो कि सामने वाला के बात में केतना सच्चाई लउकत बा. जब बनारसी के अंदाजा हो गइल कि सामने वाला के बात में दम बा तब ऊ निःसंकोच सहयोग करे के तैयार हो गइल.
'ठीक बा. आपके जवन पूछे के हो, पूछ सकत हउआ.'
बनारसी के बात सुनला के बाद पाड़ेजी अपना हाथ में लिहल पैकेट के खोल के ओकरा भीतर के सामान बनारसी के सामने करे क बाद सामान पहिचाने के कहले. बनारसी कंकाल के बचल खुचल सामान के कुछ पल गौर से देखलस. जेकरा बाद ओकरा आँखि से लोर बहे लागल. पाड़ेजी समझ गइले कि उनकर अनुमान सही साबित भइल बाकि ऊ चुपचाप बनारसी के सामान्य होखे के इंतजार करे लगले. तनिका देर बाद जब बनारसी सामान्य भइल तब उहे सवाल कइलस.
'हम त ई सोच के खामोश रहीं कि कमली कहीं मौज मजा करत होई, पर ई सब? जरुर लखनवा के काम होई ई सब?' आपन बात कहे के साथ साथ बनारसी एगो नाम लिहलस, जेकरा के लेत खानी ओकरा चेहरा पर नफरत के भाव साफ लउकत रहे. पाड़ेजी खातिर इ नया रहस्योघाटन रहे.
'कवन लखन?' पाड़ेजी सवाल कइले.
'हमरे गाँवे के हव. हमार संगी होवे के दम भरेला. वही हमके बतवले रहल कि ऊ कमली के कोई अउर क साथे बनारस में सिनेमा हाल में देखले रहल.'
'फिर?'
'हम ओकरे बात पर भरोसा ना कइली. लेकिन झूठ भी ना मनली.' बनारसी के जवाब सुन के पाड़ेजी भी सोच में पड़ गईले कि आखिर बनारसी कहे का चाह रहल बा.
'दुनो बात? ई कइसे संभव बा?' पाड़ेजी सच जाने खातिर सवाल कइले.
'गमछा महाराज हम ओकरे बात पर भरोसा नाही कइली काहे से कि हमके मालूम रहल कि ऊ कमली पर बुरा नजर रक्खत रहल अउर कमली ओके जरको भाव ना दे.
'अउरी ओकर बात झूठ भी ना मनलऽ. एकर कारण?' पाड़ेजी बनारसी के बात बीचे में रोकत नया सवाल कइले.
'ओकर वजह ई कि हम कमली के रहे सहे के ढ़ंग से पहिलही से जानत रहली कि ओकर चाल चलन ठीक नाही हव. अउर ऊ बनारस में सिर्फ काम नाही बल्कि अउर भी कुछ करत होई.'
'हम तोहरा यकीन के वजह ना जाने चाहेब लेकिन ई जरुर जाने चाहेब कि जब तोहरा यकीन रहे कि कमली बनारस में कुछ अउर भी करत होखी तब तू ओकरा के बनारस जाये ही काहे देत रहलऽ?'
'का बताई महाराज. कुछ पेट क मजबूरी. कुछ ओकर जिद. हमार काम धंधा ठीक से ना चले. जवन काम में हाथ डाली वही में नुकसान. ओपर से परिवार में एक लड़की भी आ गयल. पहिले त हम साफ मना कर देले रही मगर फिर परिवार खातिर बनारस जाके काम करे क इजाजत दे देली.
'लेकिन कमली बनारस जा के ही काम करे क पीछे काहे पड़ल रहुवे? बनारस में काम मिलिये जाई एकर कवन गारंटी रहे?'
'हमके त ऊ इहे बतवले रहल कि ओकर कोई मौसेरी बहिन हव जवन काम दियावे में ओकर मदद करी. बाकि हम ना त कबो अपने एह साली से मिलल रही ना ही ओकरे बारे में जानत रही. ' एतना कहला के बाद बनारसी चुपा गइल अउरी पाड़ेजी कुछ सोचे लगले कि कवन सवाल कइल जाव.
'आ तोहरा के कमली के चाल चलन पर कब शक भइल?' पाड़ेजी सवाल कइले.
'ओकर उम्मीद से ज्यादा रुपया ले के आवल. जेकरे बारे में ऊ हर बार कोई नया कहानी बता दे. पर हमार शक यकीन में तब बदलल जब हमके ओकरे पास एक दिन ऊ देखा गयल जेके हम लोग कब्बो ना रखले रही. ' एतना कहला के बाद एक बार फिर बनारसी खामोश हो गइल. साथे साथे ओकरा आँखी में लोर नजर आवे लागल.
'अइसन कवन चीज देख लिहलऽ भाई?' बनारसी के सामान्य भइला पर पाड़ेजी फिर से सवाल कइले.
'वही जेकरे वजह से मरद मेहरारु में केतनो सम्बन्ध बने पर बच्चा ना होई.'
'ओह.' ई सुन के पाड़ेजी बस एतने कह पइले.
'ओह दिन हम ओके बहुत समझवली कि जवन हो गयल हो गयल पर अब नाही. पर कमली नाही मनलस. शायद हमरे तरफ से देर हो गयल रहल अउर ओके पइसा क आदत हो गइल रहल. हमहु अपने परिवार अउर लड़की खातिर खामोश हो गइली अउर ई सोच के संतोष कर लेली कि कुछ भी हो शाम के कमली घरे त आ जात हव. '
'फिर जब कमली घरे ना आइल तब तू रिपोट काहे ना लिखवलऽ?' पाड़ेजी बनारसी के पूरा बात सुन के नया सवाल कइले.
'ओ दिना हमरा ओकरे में जम के झगड़ा भयल रहल अउर ऊ कह के गयल रहल कि अब ऊ कब्बो ना आई. पहिले त हम यही सोचली कि ओकर गुस्सा कम होई त खुदे आ जाई पर जब ४ दिन बीतल तब चिन्ता सताये लगल.
'फिर?' ओकरा चुप होखते पाड़ेजी तुरते सवाल दाग दिहले. मानो अब उनका से कवनो बात के जाने में देरी बर्दास्त नइखे.
'फिर एसे पहिले कि हम थाने पहुँची. हमार बड़ भाई आके रिपोर्ट लिखा देलन अउर बाकि क कहानी आपके सामने हव.'
'हूँ.' पाड़ेजी सिर्फ हुँकारी भर के रह गईले. साथे साथे कुछ सोचहु लगले. कुछ सोचला के बाद ऊ नया सवाल कइले.
'हमरा के लखन से मिले के बा. कइसे मुलाकात होखी?'
'आपके हमरे गाँव में जाये के होई. दिन भर गाँवही में आवारन क तरह घूमल करेला. कुच्छो हो जाये, ओके छोड़ेम मत महाराज.' एतना कह के बनारसी रोवत रोवत पाड़ेजी के पाँव पकड़ लिहलस. पाड़ेजी ओकरा के पकड़ के उठवले अउरी शांत करे क बाद आश्वासन दिहले कि जे भी कातिल होखी ऊ ना बची. एकरा बाद पाड़ेजी दरोगा यादव के मदद से बनारसी के गाँव में लखन से मिले खातिर निकल पड़ले.
का भइल लखन से मिल के? का लखने कातिल बा? जदि ना त का लखन कातिल तक पहुँचे में मददगार साबित होखी? जाने खातिर इंतजार करीं जा, अगिला अंक के...
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अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"











अंक - 92 (09 अगस्त 2016)

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