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कंकाल के रहस्य - 6 - अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"

पाड़ेजी के ठलुआ क नाम लेके बड़बड़ात देख सिंहो साहब चिन्ता में पड़ गइले, उनका से ना रह गइल त पाड़ेजी से सवाल कइले, 'सब ठीक त हव न गमछा गुरु?'
'बिल्कुल ठीक बा. काहे से कि सब ठीक ना होखित त ठलुआ मिस काल ना बल्कि लगातार घंटी बजावत रहत. बाकि हमरा के मिस काल कइले बा त जाये के त पड़बे करी. आप सैदपुर थाना में सूचना दिहल मत भुलायेब.' कहत पाड़े जी एतना तेजी से बहरे गइले कि उनका अपना सवाल के जवाब में सिंह साहब के हुँकारी ना सुनाइ दिहल होखी. सिंह साहब फोन उठा के ओही समय सैदपुर थाना में पाड़ेजी क बारे में सूचित करे लगले.
सिंह साहब के क्रिया कलाप से अनजान पाड़ेजी आधा घंटा में ओह जगह से गुजरले जहाँ ठलुआ आपन डेरा जमवले रहे. पाड़ेजी क मोटरसाईकिल अपना ओर आवत देख ठलुआ बीच सड़क पर गाना गावत नाचे लागल. कुछ ए तरह से कि केहु आवे जाये ओकरा रुकही के पड़े. फेर पाड़ेजी के त रुकही के रहे. ठलुआ बड़ी सफाई से उनका के एगो चिट पकड़ा दिहलस आ फिर नाचत नाचत अपना कुटिया में घुस के भजन गावे लागल. पाड़ेजी चुपचाप आगे बढ़ गइले, अउरी एगो दुकान में पान खाये क बहाने रुक के ठलुआ के दिहल कागज पर नजर डलले त ओह पर लिखल रहे कि दू आदमी एक औरत का साथे ओह जगहा पर गइल बा जहाँ पाड़ेजी के नजर बा. चिट पढ़ के पाड़ेजी सोच में पड़ गइले. फेर एगो दोसरा दुकान पर पहुँच के चाय क बहाने रुक गइले आ रास्ता पर नजर लगा दिहले.
करीब आधा घंटा बाद पहिले एक आदमी एगो औरत के साथ उहाँ से गुजरल. पाड़ेजी ओह लोग के चुपचाप जाये दिहलन जेकरा तनकिये देर बाद दूसरका आदमी ओहर से गुजरल. पाड़ेजी चाय वाला के पइसा पहिले ही दे चुकल रहन से झट से ओह आदमी क पीछे पैदले चल पड़लन. तनिका दूर गइला पर ऊ आदमी एगो बँगला में घुस गइल. पाड़ेजी ओह बँगला पर गौर से नजर डलले त उनका समझ में आइल कि बँगला शहर के जिलाधकारी के बा. ओह आदमी के भीतर गइला के थोड़के देर बादे पाड़हूजी बँगला के गेट पर पहुँच गईले आ संतरी से सवाल कइले, 'भाई हमरा किशोर से मिले के बा.'
'कवन किशोर? इहाँ कउनो किशोर नाहि हव.' पाड़ेजी के सवाल पर संतरी जवाब दिहलस. साथे साथे पाड़ेजी के सरसरी निगाह से तजबीजे भी लागल कि पाड़ेजी गलत आदमी त नाहीं बाड़न.
'कवनो किशोर नाही बा. (पाड़ेजी बड़बड़इले फिर संतरी से सवाल कइले) लेकिन सिपाही जी हम त ओकरा पीछही पीछे आ रहल बानी. हम ओकरा के आवाजो दिहलीं पर शायद ऊ सुनलस हऽ ना.' पाड़ेजी के सवाल पर संतरी तनिका देर कुछ सोचे लागल फिर जवाब दिहलस, 'ऊ किशोर नाही सोहन हव. कहा त ओके बोला दी.' संतरी पाड़ेजी के जवाब देके सवाल कइलस त पाड़ेजी ओकरा तरफ संदेह के नजर से देखे लगले. मगर आपन नाटक के ज्यादा लम्बा खींचे के बजाय बड़बड़ात सवाल कइले, 'सोहन! कमाल के बात बा. हम त ओकरा के किशोर समझ के पीछे पीछे चल दिहलीं. अब समझ में आ रहल बा कि काहे हमरा पुकारे पर जवाब ना दिहलस. हमरा के त ऊ पुरा किशोरे लागत रहे. हमरा के माफ करेब सिपाही जी हमरे गलतफहमी हो गइल रहे. खामखाह समय के बरबादी भइल.'
एतना कहला के बाद पाड़ेजी उहाँ से चल दिहले अउरी तनिका दूर दुकान पर पहुँच के आपन मोटरसाईकिल लेके घर क तरफ चल दिहले. घरे जाये के पहिले पाड़ेजी ठलुआ के निश्चिन्त रहे क एस. एम. एस. कइल ना भुलले.
घरे पहुँचला क बाद पाड़ेजी सबसे पहिले एस. पी. साहब के फोन लगा के जिलाधिकारी के घर के नौकर सोहन पर खास नजर रखे के ताकीद कइले, फेर सिंह साहब के फोन लगा के पता कइले कि ऊ सैदपुर थाना में उनका पहुँचे के सूचना दे देले बाड़े कि ना. सिंह साहब से हाँ में जवाब सुनला क बाद पाड़ेजी पंडिताईन के ठलुआ के सही सलामती के सूचना दिहले, फेर खा पी के सूत गइले. अगिला सुबह १० बजे पाड़ेजी सैदपुर थाना में थाना इन्चार्ज के साथे बइठ के ओह फाइल के देखत रहुवन जेकरा खातिर ऊ ओतना दूर से चल के आइल रहन. फाइल देखला क बाद पाड़ेजी आपन सवाल जवाब शुरु कइले. 'यादवजी, हम कारण जाने चाहेब जेकरा वजह से आप एगो पति के पत्नी के कतल के जुर्म में गिरफ्तार कइले बानी. ऊ भी तब, जब आप आजु ले लाश बरामद ना कर पईंलीं.'
'कारण त बड़ा साफ हव गमछा गुरु. अउर ऊ ई कि जहिया से कमली गायब हव, वही दिना ओकरे में अउर ओकरे मरद में जम के झगड़ा भयल रहल. बनारसी के अपने मेहरारु के चाल चलन पर शक रहल अउर एही के चलते उ कब्बो ना चाहत रहल कि कमली बनारस काम करे जाय.' पाड़ेजी के सवाल सुन के दरोगा यादव आपन जवाब देके पाड़ेजी के देखे लगले. शायद उनका पहिलही बता दिहल गइल रहे कि गमछा पाड़े के गमछा कहाइल नीक लागेला.
'दूसर कवनो वजह?' एतना सुने के बाद पाड़ेजी तनिका सा सोच के फिर सवाल कइले.
'बनारसी क अपने मेहरारु के गायब होवे क रिपोर्ट नाही लिखाना.' दरोगाजी पाड़ेजी के सवाल के जवाब दिहले. एही समय एगो हवलदार टेबल पर चाय समोसा रख के बहरी चल गइल.
'फेर पुलिस में रिपोर्ट केकरा कहला पर लिखल गइल?' पाड़ेजी समोसा उठावत सवाल कइले.
'बनारसी क बड़ भाई हव. वही आयल रहल रिपोर्ट लिखावे. ओ समय भी बनारसी इहाँ आके बवाल काटत रहल कि ओके कवनो रिपोर्ट नाहि लिखावे के हव.'
'ओकरा से रिपोर्ट ना लिखावे क कारण ना पूछलीं?' पाड़ेजी फिर सवाल कइले.
'बस एक्के बात रटत जाये कि अइसन बदचलन औरत से पीछा छूट गयल, ओके अउर कुछ ना चाही.' दरोगोजी समोसा खात जवाब दिहले.
एतना सुनला के बाद पाड़ेजी दरोगा यादव से ओह कैदी से मिले क आपन इच्छा जाहिर कइले. जेकरा खातिर यादवजी पहिले नास्ता चाय खतम करे क सलाह दिहले, आ दुनो जाना एहर ओहर क बात करत नास्ता चाय पर टूट पड़ल.
का भईल? ओह आदमी से मिले के बा, जेकरा से पाड़ेजी मिलल चाहत रहन? का कंकाल के पहिचान के तलाश इहाँ खतम हो जाई? का सोहने असली कातिल निकली? एह तरह के सब सवाल के जवाब खातिर इंतजार करीं अगिला अंक के...
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अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"











अंक - 91 (02 अगस्त 2016)

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