विविध

माटी के देहिया - सुनील सिन्हा

जौने देहिया चन्दन लगवनी,
इत्र छीड़कनी फैशन करवनी।
मोछवा अइठत रौब जमवनी,
भरल जवानी खूब इतरइनी॥

भइल बिआह परिवार बसवनी,
जिनगिया आपन आगे बढ़वनी।
घर –गृहस्थी के बोझ उठवनी,
लइकन संगे जिन्दगी बितवनी॥

बचवन संगे खेलत खेलत,
उनकर बोझ उठावत उठावत।
केशिया पाक गइल सोचते में,
लइकन बढ़ हो गइल देखते में॥

उमरिया बीतल रोग पकराइल,
दुअरा पर हमार खटिया धराइल।
खोकते खोकते सोचते रहनी,
कईसे कईसे जिनगी बितवनी॥

जौने देहिया से दुनिया बसवनी,
खूब निखरनी आ खूब सजवनी।
ओही के अब दिन निअराईल,
लागतअ की बोलाहट आइल॥

चार कन्धन के सहारा बा,
सब बन्धन से किनारा बा।
मालिक के अब बोलावा बा,
हाफिज़ खुदा तुम्हारा बा॥
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लेखक परिचय:-

नाम: सुनील सिन्हा
पेशा: सहायक संपादक (भोजपुरी पंचायत)
शिक्षा: एमबीए (एचआर) आईआईएम लखनऊ
पता: 237, अंजलि होम्स
शालिमार गार्डेन, एक्सटेन्शन - 1
सहिबाबाद,गाजियाबाद, उ प्र
ई-मेल: sunilsinha1970@gmail.com
मो: 8010346909
अंक - 88 (12  जुलाई 2016)

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