विविध

महंगाई - सुनील चौरसिया"सावन"

सूनि लऽ हे भाई!
आ गइलबा कमरतोङ महंगाई॥

अब दाँत के नीचे ना पहुँची,
सब्जी, चीनी अउरी दाल।
अमीर, गरीब दूनो भाई के,
हो गइल बाटे दशा बेहाल।
चीज रहे छोटहन चाहे बङहन,
दाम सूनि के आवत बा जम्हाई।
सूनि लऽ हे भाई!
आ गइलबा कमरतोङ महंगाई॥

पहिले खाली सामाने बिकात रहे,
अब तऽ दहेज में बिकत बाने दुलहा।
आजु हमार बेटी, काल्ह तोहार बेटी,
कहवाँ से होई महँगाई के सुलहा।
पहिले दहेज देइब फिर दहेज लेइब,
एही सब में जात बाटे मनवा ललचाई।
सूनि लऽ हे भाई!
आ गइलबा कमरतोङ महंगाई॥

दुनिया में नजरि उठा के देखि ल,
पइसा बिना रोवत बाने रोगी।
अइसन बिकराल महँगाई में,
अब तऽ हाथ मलत बाने भोगी।
गरीब बाप के बेटी दहेज के कमी से,
जान बुझि के लेली फँसरी लगाई।
सूनि लऽ हे भाई!
आ गइलबा कमरतोङ महंगाई॥

कमाई एक रुपिया के नइखे,
सूखल रोटियो मिलल भइल मोहाल।
फिर भी काहें गरीब परिवार में,
बाटे दस-दस लइकन के जंजाल।
खर्ची के कमी बा,पेट दाबि के राति काटें,
आधी राति में बिलखे बाबू, कहे- रोटी दे रे माई।
सूनि लऽ हे भाई!
आ गइलबा कमरतोङ महंगाई॥



महँगाई के रोकऽ, देश के बचाव
सूनि लऽ हे भारत के सरकार।
दहेज-प्रथा के जल्दी कर दूर,
ई हऽ सुनील के विचार।
अब तऽ सोने के चिङिया उजङि गइल,
रोवत बानी भारत माई चिल्लाई-चिल्लाई।
सूनि लऽ हे भाई!
आ गइलबा कमरतोङ महंगाई॥
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लेखक परिचय:-

नाम: सुनील चौरसिया"सावन"
शिक्षा: बीएड-हरिश्चन्द स्नातकोत्तर महाविद्यालय,वाराणसी, उ.प्र.
पता: ग्राम-अमवा बाजार,पोस्ट-रामकोला
जनपद-कुशीनगर-274305
मो.-09044974084,
08423004695
अंक - 90 (26 जुलाई 2016)

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