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जे रोअत बा रोवे दा - जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

जे रोअत बा रोवे दा
उनके दीदा खोवे दा।

नवकी बात बतावा हमके
कमियों के देखावा हमके
केहू के त थरहरी डोली
बिना बात के केके बोली
दावा के जब पता चलेला
जीतलो पर उ हाथ मलेला
जे हो रहल बा, होवे दा।
उनके दीदा खोवे दा॥

ढेला चिक्का चलल करेला
ओमे बस मजलूम मरेला
मउज मनावे चलत लुटावे
सब बिलवावे कुछो न पावे
अक्कल बेचे मजा उडावे
मस्ती में समाज भरमावे
जे सो रहल बा, सोवे दा।
उनके दीदा खोवे दा॥

मन फेरवट त रोजे चाही
भरल बजारे छुअल बाहीं
संस्कार त झारल जाता
घरे मतारी मारल जाता
चुप मार के काम करा
हर मेजी पर दाम धरा
जे बो रहल बा, बोवे दा। 
उनके दीदा खोवे दा॥

जइसन बोई ओइसन काटी
फिरो कहवां ले चंदा बाटी
उसर भइली नेह के थाती
कहवाँ हेरी आपन माटी .
धावल धूपल गाँव पहुचलीं
मुँह बिचकवले मिले संघाती
जे गोऽ रहल बा, गोवे दा।
उनके दीदा खोवे दा॥
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लेखक परिचय:-

नाम: जयशंकर प्रसाद द्विवेदी
मैनेजिग एडिटर (वेव) भोजपुरी पंचायत
बेवसाय: इंजीनियरिंग स्नातक कम्पुटर व्यापार मे सेवा
संपर्क सूत्र:
सी-39 ,सेक्टर – 3
चिरंजीव विहार, गाजियावाद (उ. प्र.)
फोन : 9999614657
अंक - 88 (12  जुलाई 2016)

1 टिप्पणी:

  1. अप्रतिम...सामयिक अउर पूर्ण यथार्थ रचना। जय-जय........प्रणाम

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